Sunday, 23 August 2015

गांधी और तकनीक




महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गाँधी विचार मंच द्वारा चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रंखला के पांचवां सप्ताह में गांधी और तकनीक विषय पर चर्चा हुई जिसमें विकास एवं शांति अध्ययन विभाग के पीएचडी शोधार्थी सह गांधी विचार मंच के संयोजक नीरज कुमार ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण पर्चा इस प्रकार है.

गांधीजी, पूरा नाम मोहनदास करमचन्द्र गांधी, जिन्हें दुनियाँ व्यक्ति नहीं विचार के रूप में स्वीकार कर चुकी है, जो सत्य व अहिंसा के प्रतीक भी हैं - उन्होंने सत्य को सत्ता से मजबूत बनाया और अहिंसा को सम्पूर्ण मानवता का केंद्र के रूप में स्थापित किया। सत्य- साध्य है, लक्ष्य है तो अहिंसा उसका साधन है। प्रकृति में जितने भी जीव-जंतु हैं, उसमें जीवन है, जीवन के बिना ये अस्तित्वहीन हैं। इसमें समाज का पूरा जीवन, जो प्रकृति द्वारा लाखों-करोड़ों साल में तय की हुई चीजें आ सकती है। जीवन है तो तकनीक है यानी जीवन ही तकनीक है। इस प्रकार हम मानव समाज से तकनीक को अलग करके नहीं देख सकते है। जैसे खेती करना जीवन का लक्ष्य या साध्य है तो तकनीक हल-बैल और बीज हो सकता है। तलाब, नदी, कुआं आदि जल संरक्षण का प्राकृतिक तकनीक रहा है। जिसे आधुनिक तकनीक ने बर्बाद कर दिया है।
जबसे तकनीक को अलग करके हमने देखना शुरू किया है यानी हल के जगह ट्रेक्टर को लाया, तलाब को बचाया नहीं, साथ ही नदियों में पुल और डैम का निर्माण करना शुरू किया है, तबसे बाजार को बढ़ावा मिला है। जहाँ से प्राकृतिक जीवनशैली के जगह कृत्रिम जीवनशैली ने मानव समाज में स्थान बना लिया है। अर्थात जिसे मनुष्य ने मानक बना रखा था उसका महत्व बढ़ गया और जो जीवन मूल्य था उसका महत्व घट गया। जैसे रूपये-पैसे, सोने-चांदी या अन्य पदार्थ अनमोल हो गये और मानवीयता का कोई मोल ही न रहा। आज मशीन के बिना कोई काम संभव नहीं है। यूँ कहें, आज कोई भी क्षेत्र मशीनीकरण से अछूता नहीं है, बल्कि हर दिन नए-नए मशीनी तकनीक इजाद हो रही है। आज जिस तरह मशीन के प्रति आसक्ति बढ़ी है, गांधीजी ने इसी आसक्ति को पागलपन कहा था। वे इसके खिलाफ थे। इसलिए उन्होंने  समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली शिक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ते हुए बुनियादी तालीम की बात की थी। जिसमें मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ हृदय और हाथ के विकास का होना आवश्यक माना था क्योंकि उनकी नजर में मानव शरीर स्वयं में एक मशीन है। अगर शरीर से जीवन को अलग कर दिया जाय तो यह संवेदनहीन हो जायेगा, इसलिए उसकी संवेदनाओं को बनाए रखने के लिए हृदय को जागृत रखना जरुरी होता है। इसके लिए शरीरश्रम का होना निहायत ही आवश्यक माना गया है।
आज का आधुनिक विकास जो पूर्णतया मशीनों के द्वारा संचालित हो रही है, हमें संवेदनहीन के साथ-साथ बेरोजगार और जड़विहीन भी बना रहा है। जिसके कारण आज तरह-तरह की सामाजिक-मानसिक बीमारियाँ तेजी से फैलते जा रही है, जो लाइलाज है। जैसे - अनिद्रा, अकेलापन, अवसाद, अविश्वास और अनास्था। आज सवाल यह है कि जहां हम समय की गति के साथ तो बढ़े  हैं, वहीं अपनी गति को कम कर लिया है और इसके लिए कितनी तत्परता एवं अभिरूचि दिखाई है जिसका नतीजा हमारे सामने दिख रहा है। तकनीकी शिक्षा को लेकर भी हमारी सोच इन्हीं पहलुओं पर केन्द्रित है। गांधी की तकनीक पर सिर्फ चर्चा हो कर रह गई है वर्ना अब-तक गाँधी माडल दुनिया को इस सारी सामाजिक बीमारियों के दलदल में फसने नहीं दिया होता।
यह विकास मुट्ठी भर लोगों के लिए है। इस विकास में पर्यावण का विनाश हो रहा है – ए.सी., कल-कारखाने से निकलने वाली जहरीली गैसें हमारे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य का भी दुश्मन हैं। इस तकनीक के आने के बाद बेरोजगारी बढ़ गई। लोग पेट की खातिर गलत करने को मजबूर हो रहे हैं। परिवार टूट रहा है, पड़ोसी दुश्मन होते जा रहे हैं, प्रकृति रोज दोहन का शिकार हो रही है। परमात्मा को भुलाया जा रहा है यानी मानवीय आस्थाओं का गला घोंटा जा रहा है।
आज फिर से गांधीजी द्वारा बताये गये मूलभूत अवधारणा को आत्मसात करने की जरूरत है तथा उनके एकादश व्रत और रचनात्मक कार्यक्रम को वर्तमान सन्दर्भ के अनुसार पाठ करने की जरूरत है। जो इस प्रकार है - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद, सर्वत्र भय वर्जन, सर्वधर्म समानत्व, स्वदेशी, स्पर्श भावना। इन सारे बिन्दओं पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। वहीं रचनात्मक कार्यक्रम को भी आत्मसात करने की आश्यकता है। जो इस प्रकार है - कौमी एकता, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, खादी, दूसरे ग्रामउद्योग, गांवों की सफाई, नयी या बुनियादी तालीम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएँ, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी, विद्याथी को चिन्हित किया गया था।
गांवों के लोग, आज भी उन सारी चीजों का उत्पादन कर रहे है, जिससे मानव और जीव जगत बचा है। फिर भी गाँव का महत्व दिनों-दिन ख़त्म होता जा रहा है। गाँव के द्वारा उत्पादित चीजों/वस्तुओं का महत्व शहरों में उत्पादित वस्तुओं के सामने फीका नजर आता है। टी.वी., फ्रीज, मोबाईल इत्यादि से भूख नहीं मिट सकती है, लेकिन महत्व इसी का है गेहूं, चावल आदि का नहीं।
                                                                                                                       नीरज  
चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच.डी, विकास एवं शांति अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि गांधी और तकनीक’,  तकनीक का अंग्रेजी में ‘technique’ होता है, जिसे प्रविधि भी कहा जाता है। यहाँ गांधी और तकनीक का मतलब गांधीजी के कार्य पद्धति से हुआ। गांधीजी के कार्य पद्धति को जानने से पहले गांधीजी के उद्देश्य को समझना जरूरी है। गांधीजी के उद्देश्य थे: अहिंसक समाज रचना, सर्वोदय समाज बनाना आदि। गांधीजी इस तरह के समाज रचना के लिए जो तकनीक इस्तेमाल किए वे थे: रचनात्मक कार्यक्रम, एकादश व्रत, विकेन्द्रीकरण, ट्रस्टीशिप, सत्याग्रह, ग्राम स्वराज इत्यादि। गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रम में 18 प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम रखे और समाज में रहकर उस पर काम किए। रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता, स्पृस्यता निवारण, शराब बंदी, खादी, दूसरे ग्रामो उद्योग, गाँव की सफाई, नई या बुनियादी तालिम, बड़ों की तालिम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियाम, प्रांतीय भाषा, राष्ट्र भाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी, विद्यार्थी। एकादश व्रत का 1930 में मंगल प्रभात नामक पुस्तक में विस्तार से उल्लेख गांधीजी ने किया है। जिसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अभय, शरीर श्रम, स्वदेशी, स्पृस्यता निवारण, सर्वधर्म समभाव है। जिसको हर कोई इसे पालन अपने जीवन में करे। विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त केन्द्रीकरण से निजात दिलाने और गाँव की शक्ति को बढ़ाने के लिए उन्होंने दिया। ट्रस्टीशिप का अर्थ गांधीजी ने संपत्ति के रक्षक या रक्षण से लिया है। जिस तरह सूर्य की रोशनी पर किसी एक का हक नहीं है सभी को बराबर मिलता है। हवा भी सभी को बराबर मिलता है, उसी तरह जमीन पर भी सभी को बराबर हक मिलना चाहिए। संपत्तिवान सिर्फ संपत्ति का रक्षक है मालिक नहीं। सत्याग्रह गांधी का अस्त्र है समाज में मनुष्य की गलत मानसिकता या कार्य को परिवर्तन करने के लिए।
एम.फिल के सुरेश कुमार ने महाराष्ट्र के अहमद नगर के हिवडे बाजार गांव के विषय में बताया जहां गांधी के तकनीक विषयों को अपनाकर लोगों ने अपना जीवन सुखी बनाया है. गांव में लोग नशाबंदी और शराबबंदी  करके मेड़बंदी, जल संरक्षण,दाल आदि उत्पादन से सबंधित कुटीर उधोग स्थापित करके गांव को हराभरा और आर्थिक सम्पन गांव बना लिया है. उनका यह कहना यह बताता है कि गांधी के तकनीक संबंधी विचार आज भी प्रासंगिक है.
फिल्म और नाट्य से एम.फिल कर रहे कृष्ण मोहन कहते हैं, जब हम अपने शरीर के अंगों का विशिष्ट प्रयोग करते हैं तो वह भी तकनीक कहलाता है. तकनीक जीवन को आसान बनाता है. गांधीजी की भी तकनीक के इस पहलू को स्वीकार करते हैं. वह जो चरखा आदि का प्रयोग करते थे. वहां भी तकनीक था. हम विकास को रोक नहीं सकते हैं लेकिन उसका स्वरूप जरूर निर्धारित कर सकते हैं. कम्प्यूटर का उपयोग हमें निर्धारित करना होगा. हम वैज्ञानिक शोध में कम्प्यूटर के प्रयोग को नहीं नकार सकते हैं. फेसबुक पर दूर देश में बैठे अपने मित्र से जरूरी बात करते हैं वह सही है लेकिन अगर हम बगल के कमरे के मित्र से बातचीत के लिए फेसबुक का सहारा लेते हैं तो वह गलत है. इसी तरह स्वास्थय क्षेत्र में गंभीर बिमारी के इलाज में एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग को नकार नहीं सकते हैं, पर हल्की बिमारी में तुरंत उसका प्रयोग सही नहीं माना जा सकता है.
जे.सी.बी मशीन 25 लोगों का काम कर सकता है लेकिन हमें निर्धारित करना होगा कि इसका प्रयोग कहां करे अगर हम सामान्य जगह पर उसका प्रयोग करते हैं तो वह गलत और मानवता के हित में नहीं हैं.वास्तव में सारी स्थितियों के निर्धारक हम स्वंय हैं जो हमारी नैतिकता से परिचालित होती है. सबके केन्द्र में नैतिकता ही है. विज्ञान वरदान भी है और अभिशाप भी है. उसे वरदान या अभिशाप हम ही बनाते हैं. तकनीक अगर आग है तो हम उससे चुल्हा जलाएं या घर को ही आग में झोंक दे, यह हमारे निर्णय पर निर्भर करता है. उनका मानना है कि विज्ञान या तकनीक का असंतुलित प्रयोग गलत है. गांधी जी तकनीक के संतुलित प्रयोग के पक्षधर थे जिसमें मनुष्य की उपेक्षा नहीं होती है. मनुष्य को उपेक्षित करके तकनीक को बढ़ावा देना उनकी समझ में मानवता को विनाश की ओर ढकेलना है.
एक अन्य सज्जन मुन्ना जी कहते हैं गांधी जी ने औधोगिक क्रांति के विरूद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास किया तो वहीं विकास जी ने इस बात से सहमति जताई की गांधी जी तकनीक के खिलाफ नहीं थे बस  जरूरत के हिसाब से और सीमित प्रयोग को स्वीकार करते थे.


स्त्री अध्ययन से एम.फिल. कर रहे नवनीत कहते हैं कि गांधी के तकनीक प्रकृति के अनुकुल है जैसे मटका जो पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करता है और मौसम के अनुसार पानी को उतना ही शीतल करता है जितना आपके शरीर को चाहिए होता है.फिर घर में मटका का होना सादगी का प्रतीक भी तो  है. मिट्टी के लेप का गांधी जी खूब इस्तेमाल करते थे और दूसरो को भी इसका उपयोग करने के लिए कहते थे. जिसके बारे रोहित जी ने बताया कि कई लोगों के साथ महादेव देसाई ने भी गांधी जी के इस प्रयोग का इस्तेमाल स्वस्थ होने के लिए किया था जो आज प्राकृतिक उपचार के नाम से जाना जाता है. फिर अंत में  मंच के संयोजक नीरज कुमार कहते हैं कि गांधी जी सत्य को लक्ष्य और अंहिसा को साधना मानते हैं. जीवन ही तकनीक है हमारा तकनीक ऐसा होना चाहिए जो हमें नैतिक और स्वालंबी बनाए तथा प्रकृति से जोड़ें रखे. वो कहते हैं कि यर्थाथ तो विज्ञान के साथ है पर मशीन मनुष्य का काम छीन रही है. विज्ञान और प्रकृति का संतुलन मनुष्य को केन्द्र में रख कर किया जाए रूढ न बनाया जाए. आगे उनका कहना है शांति को युद्ध जीत कर नहीं बल्कि मानवता को स्थापित करके लाया जा सकता है. जो सिर्फ अहिंसा के माध्यम से लाया जा सकता है.

1 comment:

  1. hamara prayas achcha hai...agr baaten thodi aur gahraai se ho to jyada achchha hoga.

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