आज
05/08/2015 को गांधी हिल पर
संध्या 5 : 30 बजे
से गाँधी विचार मंच द्वारा चलाये जा रहे 'समूह अध्ययन चर्चा श्रृंखला' के तीसरे सप्ताह के विषय 'गाँधीजी का सर्वोदय दर्शन' पर व्यापक चर्चा संपन्न हुई। इसमें
महात्मा गाँधी
अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के शोधार्थी एवं विद्यार्थीयों ने भाग लिया। चर्चा की
शुरुआत विकास एवं शांति अध्ययन विभाग के शोधार्थी चन्दन कुमार ने अपना पर्चा पढ़
कर किया।
पर्चे
में बताया गया रस्किन की पुस्तक 'अंटू दिस लास्ट' नामक पुस्तक को पढने के बाद गांधीजी के मन में यह अवधारणा बनी। गांधीजी ने 1908 में इस पुस्तक का गुजराती में अनुवाद कर
सर्वोदय नामक पुस्तक लिखी। जिसमें सर्वोदय
को निम्न रूप में समझाया गया।
क) सबों
की भलाई में ही अपनी भलाई है।
ख) नाई और वकील के काम का समान मूल्य है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को व्यवसाय द्वारा आजीविका चलाने का समान अधिकार है।
ग) किसान,
कारीगर
और मजदूर का जीवन ही सच्चा जीवन है।
सर्वोदय का दर्शन धर्म ग्रन्थों के उद्गारों में भी देखने को मिलता है। वेद सभी प्राणियों के उदय की बात करता है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चित दु:ख भाग भवेत’ में सर्वोदय का ही भाव छिपा है। ईशावास्योपनिषद के प्रथम श्लोक ‘ईशावास्यमिदम सर्वं यत किंचित जगत्यांजगत। तेन त्यक्तेन भुंजीथा: मा ग्रीध: कश्यश्चिदधनम’ तथा गीता के ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ और ‘सर्वभूत हितो रता:’ में सर्वोदय का ही भाव है। स्पष्ट रूप से सर्वोदय का प्रयोग सर्वप्रथम जैनाचार्य समंत भद्र ने ‘सर्वोदय-तीर्थ के रूप में किया था। स्त्री अध्ययन विभाग के शोधार्थी रजनीश अम्बेडकर ने सवाल उठाते हुए कहा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चित दु:ख भाग भवेत’ में सर्वोदय का ही भाव छिपा है। ईशावास्योपनिषद के प्रथम श्लोक ‘ईशावास्यमिदम सर्वं यत किंचित जगत्यांजगत। तेन त्यक्तेन भुंजीथा: मा ग्रीध: कश्यश्चिदधनम’ तथा गीता के ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ और ‘सर्वभूत हितो रता:’ में सर्वोदय का भाव दर्शाया गया है तो फिर क्यों भारतीय समाज में इतना भेद-भाव देखने को मिलता है?
विकास एवं शांति अध्ययन विभाग के एम फिल की शोधार्थी प्रज्ञा बंजारी ने भी सवाल
को इस तरह से उठाई। क्या सर्वोदय
गाँधीजी के समय में सबके लिए आया या आ चुका है या भविष्य में
आयेगा? वही
दिनेश पटेल ने सर्वोदय दर्शन को लागू करने के लिए कौन-कौन
से वो बिंदु है जिसके आधार पर जाति और सामाजिक बुराइयों को ख़त्म करने उपाय सुझाया गया है या इसमें निहित
है। एम.फिल. बौद्ध अध्ययन के शीलरतन भंते ने भी कहा जब सर्वोदय का
दर्शन मूर्त रूप से समाज में लागू नहीं हो पाया
है तो मन परिवर्तन कैसे संभव है?
मंच
के संयोजक सह विकास एवं शांति अध्ययन के पीएचडी शोधार्थी नीरज कुमार ने कहा
‘सर्वोदय’ शब्द गांधी द्वारा प्रतिपादित एक ऐसा
विचार है जिसमें ‘सर्वभूत
हितेश्ताः’ की भारतीय कल्पना,
सुकरात की ‘सत्य-साधना’ और रस्किन की ‘अंत्योदय की अवधारणा’ सब कुछ सम्मिलित है। गांधीजी ने कहा था “मैं अपने पीछे कोई पंथ या
संप्रदाय नहीं छोड़ना चाहता हूँ”। यही कारण है कि सर्वोदय आज एक समर्थ जीवन, समग्र जीवन, तथा संपूर्ण जीवन का पर्याय बन चुका है। इसे प्राप्त करने
के लिए उनका ट्रस्टीशिप सिद्धांत को जमीन पर उतारने की जरूरत है।
No comments:
Post a Comment