Thursday, 13 August 2015

साप्ताहिक,चतुर्थ परिचर्चा : महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता




महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गाँधी विचार मंचद्वारा चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रंखला के चौथे सप्ताह में महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता विषय पर चर्चा हुई जिसमें प्रदर्शनकारी कला (फिल्म और नाटक) विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत कृष्ण मोहन ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण पर्चा इस प्रकार है.
महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता
भारत में तीन महापुरुष, महावीर, बुद्ध और गांधी ऐसे हुए हैं जिनके विचारों में अहिंसा का आधार स्पष्ट दिखाई पड़ता है. महावीर और बुद्ध को ईश्वर का दर्जा प्राप्त है तो गाँधी को हमने महात्मा तक ही सिमित रखा है. जैसा कि इतिहास बताता है महावीर और बुद्ध के जीवन में चमत्कारिक घटनाएं हुई शायद इसलिए वे भगवान माने जाने लगे. उनकी अहिंसा आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गई लेकिन गाँधी के साथ ऐसा नहीं हुआ. महावीर और बुद्ध धर्म प्रवर्तक बने और गाँधी समाजसुधारक माने जा सकते हैं.
जैन धर्म में अहिंसा कठिन व्रत की तरह है. बौद्ध धर्म में मध्यम मार्ग के कारण अहिंसा का प्रभाव अपेक्षाकृत बहुत बड़े जनसमुदाय पर पड़ा. इस धर्म से प्रभावित होकर मध्य एशिया की विकराल रक्तपिपासु जातियां अहिंसक बनीं. आधुनिक समय में गांधी ने भी अहिंसा का संबल प्राप्त किया और बड़ी-बड़ी उपलब्धि पाई. गाँधी की अहिंसा सबसे अधिक व्यव्हार की धरातल पर उतरी और किसी-न-किसी रूप में सम्पूर्ण विश्व में चर्चित हुई. गांधीजी ने एक नई बात कही कि अहिंसा सामाजिक धर्म हो सकती है और पहली मान्यता के विपरीत समाज से व्यक्ति तक पहुँचाने की बात भी कही. महावीर, बुद्ध और गाँधी की अहिंसा के स्वरुप में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता है लेकिन व्यवहारगत थोडा-बहुत अंतर तो है ही.
महावीरस्वामी की अहिंसा करुणा की स्थापना पर बल देती है. उन्होंने अहिंसा का सहारा लेकर तत्कालीन पुरानी रूढ़ियों को उलटने का प्रयास किया. बुद्ध ने भी ऐसा ही किया. गाँधी ने अहिंसा के अपने सिद्धांत के माध्यम से अपने पूर्ववर्ती महावीर और बुद्ध के लक्ष्य को ही पाने का प्रयास किया. वह लक्ष्य है मानवता का कल्याण जिसके आधार बनते हैं - प्रेम और त्याग.
वस्तुतः अहिंसा तथ्यात्मक रूप से एक ही है. बस उसके अनुप्रयोग की व्याख्या में अंतर के कारण हम महावीर की अहिंसा, बुद्ध की अहिंसा और गाँधी की अहिंसा नाम से अभिहित करते है. तीनों महापुरुषों के सिद्धांतों में अहिंसा ही केंद्र में है. अन्य तत्त्व अहिंसा को ही स्थापित करने में सहायक होते है. जैसे, जैन के सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह; बौद्धों के पंचशील और गाँधी के लगभग दस अन्य तत्त्व, सभी अहिंसा को स्थापित करने वाले तत्त्व है. लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि मानवता के सुख का मूल अहिंसा को स्थापित करने वाले तीनों आचार्यों के विचारों का बहुत ज्यादा फायदा हमे नहीं मिला. जैन धर्म अपनी कठिनता के चलते बहुप्रचारित नहीं हुआ; बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में बंटा और हिन्दू कर्मकांडों जैसे आयोजनों को स्वीकार कर लिया. आधुनिक काल में बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया लेकिन वर्तमान में उनके अनुयायी इसे प्रतिशोध का अस्त्र बनाने पर तुले है जो करुणा और सहिष्णुता की भावना से कोसो दूर नजर आती है. यही भावनाएं बौद्ध धर्म का आधार थी. अब रही बात गाँधी की तो हमने उनकी हत्या ही कर डाली. 60-70 साल में ही यह लगता है कि उनके विचार और उपलब्धियां किसी और युग की बात है. अब हम सिर्फ उनके जन्म और मरण की वर्षी भर मानते है. लेकिन जब अन्नाहजारे जैसे लोग दिल्ली सिंघासन को हिलाते है तो यह परिघटना ऐसी ही अन्य ऐतिहासिक जानकारियों से मिलकर उन महापुरुषों की अहिंसा के सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता पर सोचने को विवश करते है.
अहिंसा की सूक्ष्म परिभाषा में उलझने के बजाय हम मोटे तौर पर भी सोचें तो यह बात सामने आती है कि अहिंसा का मतलब है, किसी भी जीव को शारीरिक, मानसिक क्षति नहीं पहुचाना; त्याग और प्रेम की स्थापना; मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट नहीं देना. अगर हम मन, वचन और कर्म से या फिर उनमें से किसी एक से भी दूसरे जीव को कष्ट पहुंचाते है तो वह पाप है. वर्तनाम समय में पाप और पुण्य की परिभाषा ही बदलती जा रही है पर विवाद का स्वरूप नहीं. सूक्ष्मता की आवश्यकता नहीं है सामान्य रूप से भी हम समझ सकते हैं कि सभी समस्याओं की जड़ में हिंसा ही है. आज सम्पूर्ण विश्व में जो युद्ध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, यौन अपराध, जातीय अस्मिता के झगड़े आदि सभी के जड़ में हिंसा ही है. अतः इन समस्याओं का समाधान अहिंसा से ही हो सकता है. इसलिए वर्तमान समय में अहिंसा की प्रासंगिकता तो है ही. सिर्फ वर्तमान समय में ही नहीं इतिहास की घटनाओं और भविष्य की संभावनाओ को देखकर यह आसानी से कहा जा सकता है कि अहिंसा की सर्वकालिक प्रासंगिकता है चाहे हम इसे अपने जीवन में उतार पाएं या नहीं.
खासकर गाँधी की अहिंसा सबसे अधिक व्यव्हार का आधार ग्रहण करती है इसलिए यह महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध की अहिंसा के सिद्धांतों से ज्यादा प्रासंगिक है.
—   कृष्ण मोहन.
पर्चा पठन के बाद हुई परिचर्चा में उपस्थित शोधार्थियों-विद्यार्थियों में से कुछ लोगों ने उल्लेखनीय टिप्पणी कि जो निम्न प्रकार है.
चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच.डी, विकास एवं शांति अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि जैन धर्म ने अहिंसा की गहराई को बताने का काम किया है लेकिन जटिलता के चलते आम जीवन में अपनाना बहुत मुश्किल है. बौद्ध धर्म में अहिंसा को लचीला बनाते हुए मध्यम मार्ग का रास्ता दियागया है वहीं गांधीजी ने अहिंसा को समाज के लिए सर्वव्यापि बनाते हुए आम जीवन में अहिंसा के महत्त्व को बताया है. गांधीजी अहिंसा का पालन मन, वचन और कर्म से करने की बात कहते है. गांधीजी की अहिंसा प्रेम का दर्शन है. गांधीजी सत्य की प्राप्ति के लिए अहिंसा को आवश्यक मानते है. वे कहते है कि, जब में सत्य को खोजता हूँ तो अहिंसा कहती है कि मेरे द्वारा खोजो और जब में अहिंसा को खोजता हूँ तो सत्य कहता है मेरे द्वारा खोजो. इस तरह गांधीजी सत्य और अहिंसा की तुलना ऐसे चकती से करते है जहाँ यह कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा भाग अहिंसा है और कौन सा भाग सत्य. दोनों में अन्योनाश्रय संबंध है. गांधीजी के आश्रम में एक बछड़े के बीमार होने और इलाज कराने पर भी ठीक नहीं होने पर गांधीजी उसके कष्ट को सहन नहीं कर पाए और जहर की सुई देकर मारने की बात करते है. इससे जाहिर होता है कि गांधीजी की अहिंसा में कष्ट को देखना हिंसा है.
राकेश आनंद (पी-एच. डी., बौद्ध अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि, काया, वाणी एवं मन से किया हुआ कर्म जो स्वयं में तथा दूसरों को भी कष्ट नहीं पहुंचाता है उसे अहिंसा कहते है. आगे बुद्ध कहते है कि जिस प्रकार माता अपने एकलौते पुत्र को प्यार करती है उसी प्रकार इस पृथ्वी पर सभी जीवों के प्रति मैत्री करनी चाहिए ना किसी को मारे ना किसी के द्वारा मरवावे. अहिंसा का मतलब ही होता है मैत्रीपूर्वक व्यवहार करना. जहां पर धर्म, संप्रदाय, जाति तथा यहाँ तक कि देशवाद से भी ऊपर उठकर मानव कल्याण के बारे में चिंतन-मनन करना. इसका उदाहरण महाराजा अशोक के शासन काल में देखी जा सकती है. उन्होंने मानव के साथ-साथ पशुओं के भी औषधालय खुलवाए तथा पेड़-पौधों लगवाकर के निसर्ग का संरक्षण किया तथा युद्ध से नहीं मानव के ह्रदय परिवर्तन से अहिंसा के मार्ग पर बढे. बुद्ध कि अहिंसा मनोवाचिक पर विशेष जोर देता है. क्योंकि सभी दुःख एवं सुख का अनुभव मन ही करता है. इसलिए मन को संवर किया जाए तो सभी दुखों से मुक्ति पा सकते हैं. जब तक आप अपने जीवन सदाचरण का पालन नहीं करते तब तक चित्त की प्रवृत्ति हिंसात्मक ही बनी रहती है इसलिए बुद्ध ने पंचशील का सिद्धान्त दिया जिसमें पहला ही शील है मैं किसी भी प्राणी का हिंसा नहीं करूंगा. तथा सादगी सौहार्द पूर्वक सभी के साथ व्यवहार करूंगा. दूसरा शील में मैं चोरी नहीं करूंगा. बिना पूछे किसी का सामान नहीं लेना. तीसरा मैं अनैतिक संबंध नहीं स्थापित करूंगा. चतुर्थ मैं झूठ, निंदा, चुगली, व्यर्थ कि बड-बड बातें नहीं करूंगा, पांचवां मैं किसी भी प्रकार का मादक द्रव का सेवन नहीं करूंगा. इस प्रकार नीति शास्त्र परख सिद्धान्त देकर बुद्ध ने अहिंसात्मक प्रवृत्ति का समाज को मार्गदर्शन किया. अंगुलीमाल डाकु को जिन्होंने ९९९ मनुष्यों का वध करने वाला अपने अहिंसात्मक प्रवृत्ति से उसका मन परिवर्तन करके उसे दानव से मानव बना दिया.
साहित्य विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत रमेश कुमार राज ने कहा, महावीर और बुद्ध दोनों महापुरुष मजबूती के साथ वर्ण आधारित वर्तमान समाज का विरोध कर अपनी बात रख सके। इनके समय में ब्राह्मण कर्मकांड अपने चरम पर था। वैदिक धर्म की आड़ में ब्राह्मण समाज का जबर्दस्त शोषण कर रहे थे। अश्वमेध और पुरुषमेध जैसे यज्ञ के नाम पर पशुओं और और नरों  की बलि दी जा रही थी। संभवतः यही से इन महापुरुषों के मन में अहिंसा का भाव पैदा हुआ होगा। उस समय इस हिंसा के विरोध का सीधा-सीधा मतलब वैदिक धर्म और ब्राह्मणवादी कर्मकांड के अस्वीकार करने से था। इसलिए दोनों ने ब्राह्मण के अनेक तत्वों का विरोध भी किया। वेदों को अकाट्य प्रमाण नहीं माना। लगभग दोनों ने ही इस बात पर जोर दिया कि वैदिक धर्म हीन विद्या है और किसी भी तथ्य को व्यक्तिगत परीक्षण के बाद ही स्वीकार करना चाहिए न कि परंपरागत मान्यताओं के आधार पर। बुद्ध ने यह बताया भी कि वेदमंत्र जलविहीन मरुस्थल और पंथहीन जंगल है। इसलिए उन्होंने यज्ञ का विरोध किया और बताया कि यज्ञ में जीवों का विनाश पाप है। इसीलिए महावीर ने जिन पाँच महाव्रतों का और बुद्ध ने जिन दस शीलों के पालन का उपाय बताया उसमें अहिंसा समान रूप से विद्यमान है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इनकी अहिंसा विषयक अवधारणा व्यक्तिक से सामाजिक की ओर अग्रसर हो रही थी।
अब जहां तक गांधी जी की ‘अहिंसा’ विषयक अवधारणा की बात है तो इसके बारे में यह कहा जा सकता है कि यह समाज से राष्ट्र और राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय की ओर अग्रसर प्रतीत होती है। क्योंकि जिस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे वह ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रथम विश्वयुद्ध का दौर था और गांधीजी ने इस बात को बड़ी गहराई से महसूस किया कि इस युद्ध में हमने क्या खोया और क्या पाया है। इस युद्ध ने कई देशों के अस्तित्व को खत्म कर दिया था। राष्ट्र लोलुपता आदमी को आदमी का दुश्मन बना रहा था। धर्म के नाम पर सांप्रदायिक दंगे शुरू हो रहे थे और जो कमजोर थे वह फिर उठ खड़े होने और संघर्ष करने के प्रयास में थे। द्वितीय विश्वयुद्ध का होना इसी संघर्ष का परिणाम है। इसलिए दूसरा महायुद्ध न हो, इसके लिए जिस बड़े हथियार का गांधीजी ने इस्तेमाल किया वह ‘अहिंसा’ है। लेकिन गांधीजी  की यह पराजय ही कहा जाना चाहिए कि द्वितीय महायुद्ध को वे रोक न सके। अतः गांधीजी के अहिंसा को न केवल भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक पक्षों को ध्यान में रखते हुये व्यापक धरातल पर सोचने और समझने की आवश्यकता है।

नवनीत कुमार, एम.फिल. स्त्री अध्ययन, ने कहा, जैन धर्म के त्रिरत्न हैं सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक आचरण. त्रिरत्न के अनुशीलन में पाँच महाव्रतों में अहिंसा की भी बात कही गई है. इस अहिंसा में सुक्ष्म हिंसा से भी बचने पर जोर दिया गया है. जिसको अक्षरश: पालन करना अंसभव है जैन धर्म की यह विशेषता हो सकती है. पर जैन धर्मी इस सुक्ष्म हिंसा से अपने आपको कितना बचा पाते हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है? जैन धर्म की अहिंसा को आज के भौतिक जीवन से जोड़कर देखने पर लगता है कि यह सिर्फ कहने की बात हो सकती है। बहरहाल जब हम इस अहिंसा को बौद्ध धर्म के बनाए दस शीलों पर रखकर देखते हैं तो मुझे लगता है कि जैन धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म में जो अहिंसा की बात कही गई है वह कहीं ज्यादा आत्मसात करने योग्य लगती है. जैसा कि भगवान बुद्ध ने जब अंगुलीमाल से कहा कि वह पत्ता जो तुम तोड़कर लाए हो उसको पुन: जोड़कर आओ तो वह डाकू अंगुलीमाल सीदे शब्दों में कहता है डाल से टूटा हुआ पत्ता कभी भला जुड़ सकता है क्या, मानो वह भगवान बुद्ध को ही समझा रहा हो कि आप मुर्ख हैं क्या ...इसलिए बुद्ध की शिक्षा जैन धर्म की तुलना में कहीं ज्यादा सरल लगती है. जब हम गांधी की अहिंसा की बात करते हैं तो मुझे लगता है कि लोक जीवन में उनकी बातों को अमल में लाया जाए तो उसका तुंरत असर दिखता है, उन्होंने अहिंसा को बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, के जरिए  आत्मसात करने को कहते हैं ये तीनो बातें बहुत ही सरल हैं. 
अंत में मंच के संयोजक नीरज कुमार ने कहा कि महावीर (जैन धर्म ) द्वारा प्रतिपादित अहिंसा मनुष्य को विरक्ति की ओर ले जाती है. चूँकि इनकी अहिंसा में खान-पान से लेकर सभी तरह के सुक्ष्म अहिंसा की बात कही गई है जो साधारण मनुष्य द्वारा  पालन कर पाना संभव नहीं है. क्योंकि मनुष्य जब किसी प्रकार की जैविक क्रिया करेंगे, तो उस वक्त सूक्ष्म हिंसा होना स्वभाविक हो जाता है. अत: इसे पालन कर पाना जीव जगत में संभव नहीं है.
बुद्ध की अहिंसा को देंखे तो वहां स्पष्ट तौर पर यह दिखता है कि जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकता हूँ तो उसका जीवन लेने का हमें कोई अधिकार भी नहीं बनता है. फिर क्यों उसके जीवन से जुड़े अधिकारों को बाधित करूँ, बुद्ध के अहिंसा का विचार से मनुष्य की चेतना का निर्माण होता है. यहाँ इनके विचार मन, वचन और कर्म में एकरूपता लाता है.
जबकि गाँधी की अहिंसा वर्तमान समय के सभी आयामों को जोड़ते हुए जैसे, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन शैली को प्राकृतिक जैविकता के आधार पर संरक्षित करने की बात करती है. जहाँ एक ओर अंतरराष्ट्रीयता पर बल प्रदान करती है तो वहीं मानवता के दिशा में बढ़ती हुई दिखती है. गाँधी अहिंसा की बात करते हुए यह कहते हैं हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है और अहिंसा प्रेम दया और करुणा को जन्म देती है. इसे हम इस रूप में समझ सकते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध को जन्म दिया. जहाँ एक और द्वितीय विश्वयुद्ध का नेतृत्व कर रहे दुनियां के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर ने हिंसा के सहारे दुनियां को बदलना चाहा वहीं दूसरी ओर अहिंसा के माध्यम से दुनियां को नष्ट होने से बचने की बात गाँधी कर रहे थे. भारतीय दर्शन में अहिंसा का विचार पूर्व से विद्यमान था, जिसे गाँधी ने  नया आयाम दिया.  इस आधार पर महावीर और  बुद्ध के इस दर्शन को व्यापक फलक पर लाने में गाँधी ने जो काम किया है वह आज भी प्रसांगिक है.

1 comment: