Sunday, 30 August 2015

अरस्तू





महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गाँधी विचार मंच द्वारा चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रृंखला के छठे सप्ताह में अरस्तू’ के विचार और दर्शन पर चर्चा हुई जिसमें स्त्री अध्ययन विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत नवनीत कुमार ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण पर्चा इस प्रकार है.
अरस्तु पर पर्चा तैयार करते समय मेरे मन में यह चलने लगा ये कौन है,क्या है ये, क्यों हैं ये, कहां है ये, कब...ये तमाम विचार मेरे मन में घुमने लगे. अरस्तु  एक मानव था जिसके अपने देखने का नजरिया था  जिसके अपने दर्शन थे  .... नवनीत तुम क्या हो जो पहले अरस्तु बोलते हो फिर देखने का नज़रिया फिर दर्शन .... हां मैं ठीक तो बोल रहा हूं देखने के नजरिया जिसको दर्शन कहते हैं मैं इसे सरल भाषा में कहता हुं कि जैसे प्यार क्या है तो हमलोग कहते है कि एक लड़का जो किसी लड़की से प्यार करता है एक लड़की जो एक लड़का से प्यार करता है इसी को प्यार कहते हैं. पर अरस्तु  ने कहा प्यार के बारे में कहा प्यार एक ही आत्मा से बना है जो दो शरीर में बसता है Love is composed of a single soul inhabiting two bodies.
ये उनका दर्शन या देखने का नज़रिया है.... तो मुझे लगता है कि अरस्तु के बारे में चर्चा करने से पहले दर्शन के बारे में चर्चा हो जाए ये देखने का नजरिया का क्या है जिसे लोग भद्र लोग दर्शन कहते हैं.. जहां दर्शन की बात होती है वो दर्शनशास्त्र... और...जिनकी दर्शन की बात हम लोग करते हैं, वे दार्शनिक कहलाते हैं...ये दार्शनिक किसी भी वस्तु को के बारे में सवाल करना फिर उस सवाल की खोज करना .. जैसे सत्य की प्रकृति क्या है ...............................................................ये सवाल किसी भी विषय में हो सकता हैं.... जैसे......

X ज्ञान मीमांसा,Epistemology (Question about Knowledge).
X अध्यात्मविज्ञान Metaphysics (Time, Space, God, Cause, and Reality)
X नीति Ethics (Good and Bad)
X सौंदर्यशास्र Aesthetics (Art and Beauty)
X राजनिति Political Philosophy
अरस्तु प्रश्न करते हैं आखिर पेड़-पोधा एक ही जगह पैदा होते हैं वहीं जीवन खत्म हो जाता है एक जगह से दूसरे जगह क्यों नहीं जाते हैं...फिर अरस्तु प्रश्न करते हैं कि कैसे अंडे में चूजा का कैसा विकास हो जाता है? ... अरस्तु के नीति के चार दार्शनिक सवाल थे.....
पहला – ऐसा क्या है जो मनुष्य को खुश रखता है?
  • झगरालू------मित्रता-----चापलूसी
·         बेशर्मी(shamelessness)----------शील(Modesty)---------शर्म(Shayness)
 
·         कायरता------ साहस----------आतुरता
 
दूसरा- कला क्या है ? कला क्यों बना है?
 कला का मतलब है कि जैसे जीने का मतलब सिखाता है...जैसे आपके लाइफ में कोई आपदा आई हो और आप इतना टूट गए कि आप अपने जीवन को ही खत्म करना चाहते हैं तो कला ही आपको एक सकारात्मक विचार देता है.... जैसे कोई मनुष्य ये मान लेता है  कि मैं कमजोर व्यत्ति हूं मैं किसी से भी जीत नहीं सकता हूं तो क्या होगा उसके सामने चींटी भी आएगीं तो डर जाएगा लेकिन उसी व्यत्ति  को कोई ऐसा नाटक,उपन्यास,सिनेमा प्रतिदिन दिखाया जाए... तो वो एक दिन इतना मजबूत हो जाएगा कि उसके सामने कोई सांप आ जाए या कोई WWWF  का पहलवान उसे भी हारने में वो सक्षम हो जाएगा...
तीसरा- दोस्ती क्या है दोस्त कौन हैं क्यों हैं?
दोस्ती तीन तरह की होती है
·         वो जो जिसमें आप किसी के होने की खुशी मना रहे होते ....जैसे आप कबड्डी मैंच देख रहे हैं और आपके साथ कई लोग उसका चेयर कर रहे हैं....वो भी एक दोस्ती है जहां उस टीम के जीतने का खुशी आप मना रहे होते हैं........
·         दूसरी दोस्ती वो होती है जो किसी के साथ होने से आप खुश होते हैं जैसे आप एक क्रिकेटर है और आप धोनी को अपना प्रिय मानते हैं तो अगर धोनी  के साथ है तो आपको वह खुशी महसूस होगी... या आप राजनैतिज्ञ है तो आपको अपनी पार्टी के शीर्ष नेता के साथ होना आपको खुशी देगा...
·         तीसरी दोस्ती वो होती है जिसमें आप एक दूसरे में इतना घुले मिल गए होते  हैं आपका हार उसकी जीत या उसकी जीत या आपकी हार कोई मायना नहीं रखता है..उसका दुख आपका दुख उसकी खुशी आपकी खुशी.....कोई फर्क नहीं पड़ता .....आप दोनों के बीच मैं का अह्म नहीं रहता.....
चौथा - आप अपने विचारों को इस वयस्त लाइफ में कैसे काटते हैं?
  जैसे  विद्धान एक पहलवान  से पस्त हो जाता है मतलब कि वह पहलवान उस विद्धान की विद्दता को टिकने ही नहीं देता है..इसलिए  अरस्तु का कहना है कि विचार का ये मतलब नहीं है कि इसको सही साबित करने के लिए किसी विचार के उपर थोप दो....  ये मतलब नहीं हुआ कि आप विचार का युद्ध करवा कर किसी पर जीत हासिल कर सकते हैं ..  अरस्तु कहते हैं कि आपके विचार पर कितने लोग सहमत है कितने लोग असहमत है फिर आपके विचार सहीं हैं या फिर गलत हैं.... इसलिए  अरस्तु कहते हैं कि किसी विचार को आम लोगों के बीच में रख ही कुछ निर्णय लेना चाहिए......  
आज क्या हो रहा है हमलोग गुस्सा कर रहे हैं ,आपस में बातों ही बात में झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को मार रहे हैं सबकुछ गढ-मढ होते जा रहा है किसी तरह का कोई अनुशासन नहीं रह गया है, दर्शन के दिन-प्रतिदिन के जीवन में कोई मायना नहीं रह गया है ... लेकिन जो मनुष्य किसी के दर्शन पर चलते हैं  तो उनके जीवन में सबकुछ सही होता है ये दर्शन सफलता का  रास्ता दिखलाता है,जीने की  कला सिखाता है अच्छे बुरे की पहचान बतलाता है विषय पर व्यापक ज्ञान देता है....इसी के साथ मैं अपनी बातों को रोक रहा हूं...मुझे आपके चहरे की मुस्कान से लग रहा है कि मैं अपनी बातों को समझाने में सफल रहा हूं..ईमानदारी से मैं एक बात कहना चाहता हूं... मैंने यहां जो भी अरस्तु या दर्शन की बात किया...सिर्फ प्रंराभिक ज्ञान है क्योंकि मुझे दर्शन के  शुन्य ज्ञान हैं...इसलिए मैं आप सभी का आभारी हूं... कि आपने मुझे मौका दिया.... साथ ही मैं  एक बात बताना चाहता हूं कि  शायद ही मैं कभी पब्लिक फोरम में कुछ बात रखा हूं .... पब्लिक लाइफ रही है लेकिन मैं खुद में रहना पंसद करता हूं...ज्यादा दोस्त....ज्यादा बातें मुझे पंसद नहीं है......बोलने से ज्यादा में सुनने में ध्यान देता हूं.... किसी भी विषय का सूक्ष्म अध्ययन मुझे अच्छे लगता है.... धन्यवाद....


सुरेष डूडवे, एम.फिल., हिंदी एवं तुलनात्म साहित्य विभाग अरस्तु यूनानी दार्शनिक थे। उनका जन्म स्टेगेरिया नामक नगर में सन 384 ईसा पूर्व में हुआ था। व उनका निधन 322 ईसा पूर्व में हो गया था। अरस्तु ने भौतिक, अध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनीति शास्त्र , नीतिशास्त्र, जीवविज्ञान सहित कई विषयों पर रचना की।
·        अरस्तु ने अपने गुरू प्लेटो के कार्य को आगे बढ़ाया।
·        प्लेटो, सुकरात और अरस्तु पश्चिमी दर्शनशास्त्र के सबसे महान दार्शनिकों में से एक थे। उन्होंने पश्चिम दर्शनशास्त्र पर पहली व्यापक रचना की जिसमें नीति, तर्क, विज्ञान, राजनीति और अध्यात्म का मेलजोल था।
·        भौतिक विज्ञान पर अरस्तु के विचार ने मध्ययुगीन शिक्षा पर व्यापक प्रभाव डाला और इसका प्रभाव पुनर्जागरण पर भी पड़ा। अंतिम रूप से न्यूटन के भौतिकवाद ने इसकी जगह ले लिया।

अरस्तु के अनमोल विचार
·        मनुष्य प्राकृतिक रूप से ज्ञान की ईच्छा रखता है।
·        सभी भुगतान युक्त नौकरियां दिमाग को अवशोषित और अयोग्य बनाती है।
·        डर बुराई की अपेक्षा से उत्पन्न होने वाला दर्द है।
·        मनुष्य के सभी कार्य इन सातांे में से किसी एक या अधिक वजहों से होते है- 1. मौका 2. प्रकृति 3. मजबूरी 4. आदत 5. कारण 6. जुनून 7. ईच्छा
·        कोई भी उस व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जिससे वो डरता है।
·        बुरे व्यक्ति पश्चाताप से भरे होते है।
·        कोई भी क्रोधित हो सकता है यह आसान है लेकिन सही व्यक्ति सही सीमा में सही समय पर और सही उद्देश्य के साथ सही तरीके से क्रोधित होना सभी के बस की बात नहीं है और यह आसान नहीं है।
·        मनुष्य अपनी सबसे अच्छे रूप में सभी जीवों में सबसे उदार होता है लेकिन यदि कानून और न्याय ना हो तो सबसे खराब बन जाता है।
·        संकोच युवाओं के लिए एक आभूषण है, लेकिन बड़ी उम्र के लोगों के लिए धिक्कार।
·        जो सभी का मित्र होता है वो किसी का मित्र नहीं होता है।
·        चरित्र को हम अपनी बात मनवाने का सबसे प्रभावी माध्यम कह सकते है।
·        लोकतंत्र तब होगा जब गरीब व्यक्ति ना कि धनाड्य शासक हो।
·        शिक्षा बुढ़ापे के लिए सबसे अच्छा प्रावधान है।
·        उत्कृष्टता वो कला है जो प्रशिक्षण और आदत से आती है। हम इसलिए सही कार्य नहीं करते है कि हमारे अंदर अच्छाई या उत्कृष्टता है, बल्कि वो हमारे अंदर इसलिए है क्योंकि हमने सही कार्य किया है। हम वो है जो हम बार-बार करते हैं इसलिए उत्कृष्टता कोई कार्य नहीं बल्कि एक आदत है।



चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच. डी., विकास एवं शांति अध्ययन विभाग) ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, अरस्तू को राजनीति शास्त्र का जनक से जानते है, लेकिन अरस्तू दास प्रथा के उत्प्रेरक भी रहे है। अरस्तू प्लेटो के शिष्य थे, 20 वर्षों तक शिक्षा पायी थी। अरस्तू का जन्म मेसीडोनिया सागर के किनारे स्थित स्टेगिरा नामक ग्रीक उपनिवेश में 384 ईस्वी पूर्व में हुआ था। अरस्तू की महानता हमें उनके जीवन में नहीं देखने को मिलती है, उनकी लेखन कृतियों में देखने को मिलती है। अरस्तू का मानना है कि, जो समाज में नहीं रहता वह देवता है अथवा दानव। अरस्तू ने राज्य की उत्पत्ति के तीन चरण बताए हैं। पहला, परिवार एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि राज्य के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया में परिवार पहली इकाई है। दूसरा, गाँव एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि, राज्य की उत्पत्ति में गाँव दूसरा स्तर है। तीसरा, राज्य, जिसमें उनका मानना है कि, विकास की इस प्रक्रिया में तीसरा चरण राज्य का होता है। जब कई गाँव इकट्ठे होते हैं तब राज्य का निर्माण होता है। राज्य के स्वरूप के बारे में अरस्तू का मानना है कि, राज्य एक स्वाभाविक संस्था है, राज्य का स्थान परिवार से पहले है, राज्य एक सर्वोच्च व आत्मनिर्भर समुदाय है, राज्य का स्वरूप जैविक है। राज्य के उद्देश्य के बारे में अरस्तू का मानना है कि, राज्य का अस्तित्व केवल जीवन के लिए नहीं, वरन अच्छे जीवन के लिए है। कई विद्वानों ने अरस्तू के राज्य विषयक मूल्यांकन किया है, जिसमें मानना है कि, परिवार को मानव संगठन की पहली इकाए मानना त्रुटिपूर्ण है। परिवार का उद्भव बाद में हुआ जब लोगों में सार्वजनिक नैतिकता की भावना पैदा हुई और उन्होंने उस प्रारंभिक जीवन के ढंग को त्याग दिया, जिसमें स्त्री व पुरुष पशुओं की तरह परस्पर मिलते थे। आकस्मिक व अस्थायी संसर्ग करके यह जाने बिना अलग हो जाते थे और बाद में इसका कोई पता नहीं रहता था कि उससे संसर्ग से होने वाली संतान के माता-पिता कौन थे। राज्य को मानव शरीर ही मान लेना अनुचित है। राज्य की वेदी पर व्यक्ति का बलिदान करना अरस्तू की भूल है। राज्य के उद्देश्य व कार्य संबंधी विचार अस्पष्ट हैं। दासता संबंधी अरस्तू के विचार अमानुषिक एवं प्रतिक्रियावादी हैं। अरस्तू मानते है कि, प्रकृति द्वारा कोई भी बेमतलब काम नहीं किया जाता है। प्रकृति लोगों को शासक और शासित की श्रेणी में बांटती है। ये क्षमता सबमें नहीं बल्कि कुछ ही लोगों में पाई जाती हैं। इनके बीच की यह असमानता न्यायपूर्ण है। अरस्तू का यह मानना है कि, दासों और सेवकों का होना उसी प्रकार स्वभाविक व आवश्यक है जिसप्रकार संतान उत्पादन के लिए स्त्री का होना। दास का यंत्र से तुलना अरस्तू करते है। दास का गुण सिर्फ आज्ञा पालन का होना चाहिए। दासता का औचित्य इसलिए मानते है कि प्रकृति में जन्मजात असमानता है। यह प्राकृतिक वास्तविकता है, स्वामी वर्ग की आवश्यकता के लिए दास वर्ग का होना जरूरी है। अरस्तू के शिक्षा विचार में शिक्षा का अर्थ नागरिकों को संविधान के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देने से है। अरस्तू स्त्रियों की शिक्षा की बात करते है, लेकिन पुरुषों जैसी शिक्षा देने की बात नहीं करते है, क्योंकि दोनों के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। स्त्रियों द्वारा राजनीति में भाग लेने का समर्थन करते है। शिक्षा को तीन क्रम में बांटते हुए पहला क्रम में 1 से 6 वर्ष के बच्चे को रखा है जिसमें भोजन व्यवस्था तथा शारीरिक विकास की बात करते है। द्वितीय क्रम में 7 से 14 वर्ष के बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चे लिखना-पढ़ना, चित्रकला, संगीत जैसे विषय सीखें। तृतीय क्रम में 14 से 21 वर्ष के बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चों का चारित्रिक और मानसिक विकास हो। शासनों का वर्गिकरण अरस्तू ने इस प्रकार किया है। जब शासन एक व्यक्ति, कुछ व्यक्तियों अथवा बहुसंख्यक व्यक्तियों द्वारा सामान्य हित साधना की दृष्टि से किया जाता है, तो वह शासन का शुद्ध रूप होता है, पर जब शासन चाहे वह व्यक्ति का हो, या कुछ व्यक्तियों का हो अथवा बहुसंख्यक व्यक्तियों का हो, सार्वजनिक हित की साधना की दृष्टि से नहीं किया जाता है, तो उसका रूप विकृत शासन का होता है। राज्य व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के तीन सिद्धान्त दिए है। पहला, जब एक व्यक्ति के हाथ में सत्ता होती है उसे राजतंत्र कहा है जो राज्य का विशुद्ध रूप है। जब यह विकृत हो जाता है तब अत्याचारी शासन में तब्दील हो जाता। दूसरा, कुछ व्यक्तियों द्वारा जब सत्ता धारण किया जाता है तो राज्य का विशुद्ध रूप कुलीन तंत्र कहलाता है। जब यह विकृत हो जाता है तब यह वर्ग तंत्र या गुट तंत्र का रूप ग्रहण कर लेता है। तीसरा, जब समस्त या अधिकांश व्यक्ति के हाथ में सत्ता आती है, तो राज्य का शुद्ध रूप वैधानिक राजतंत्र का होता है, लेकिन जब यह विकृत हो जाता है तो वह भिड़तन्त्र में तब्दील हो जाता है। इस तरह अरस्तू का मानना है कि शासन का कोई भी रूप स्थायी नहीं है परिवर्तन का स्वरूप चक्रिय होता है। शासन के तीनों रूपों में से अरस्तू ने राजतंत्र को शासन का आदर्श रूप माना है। जो व्यक्ति सर्वगुण संपन्न हो और जो राज्य की सब प्रजा के विविध रूपों से ज्ञात हो ऐसे व्यक्ति को सच्चे रूप से मनुष्यों में ईश्वर माना जा सकता है। निर्धनता को क्रांति एवं अपराध की जननी मानते है। निर्धनों की संख्या अधिक होने पर राज्य का अंत शीघ्र हो जाता है।
             
मंच के संयोजक नीरज कुमार ने अरस्तू के विचार पर विचार करते हुए कहा कि अरस्तू जिस सिद्धांत को विस्तार दिए, बस्तुत: उस सिद्धांत को सर्वप्रथम उनके गुरु प्लेटो ने प्रतिपादित किया था. प्लेटो के अनुसार कला या काव्य सिर्फ सत्य का रह्स्योंउद्घातन करने, मानव कल्याण, शिक्षा व आनंद प्रदान एवं राष्ट्रौत्थान के लिए हो सकता है. लेकिन बेहतर जीवन के लिए नहीं, इसलिए कवि या काव्य रचनाकारों का महत्व वो एक मोची और बढई से कम आकते है. इसके आधार पर प्लेटो कहते है कि कविता भावों को उद्वेलित कर व्यक्ति को कुमार्गगामी बनाता है, वो रचनात्मक काम न करके एक ऐसे काम को अंजाम देते है, जिससे लोग कामचोर और निक्कमे बनेंगे तथा नैतिक बल, भावात्मक स्वरूप, बौद्धिकता, शुद्ध उपयोगितावादी को कमजोड करेंगे. अर्थात प्लेटो काव्य का महत्व को वही तक स्वीकार करते हैं जहाँ तक वह गणराज्यों के नागरिकों में सत्य, सदाचार की भावना को प्रतिष्ठित करने में सहायक हो सकता है.
काव्य और कवि को प्लेटो ने जिस विचार के आधार पर लगभग खारिज करते हैं, उसी काव्य और कवि को अरस्तू अपने विचार के आधार पर स्थापित करते हैं. वे नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनैतिक शास्त्र, निति शास्त्र आदि विधाओं में आपसी तालमेल पाते है. वही अरस्तू अनुकरण में पुर्नरचना का समावेश किया. उनके अनुसार अनुकरण हू-ब-हू नक़ल नहीं बल्कि उसमें पुर्नरचना भी शामिल है. अनुकरण के द्वारा कवि और कलाकार सार्वभौम को पहचानकर पुन: नये स्वरूप में स्थापित करता है. अरस्तू केवल जीवन के लिए नहीं बल्कि अच्छे जीवन की पुनर्रचना की स्थापना की बात करता है. परन्तु प्लेटो राज्य हित में जीवन को व्यवस्थित करना चाहते है.     
     इसलिए अरस्तू अनुकरण में काव्य और कला के माध्यम से जीवन का विस्तार होते देख्रते है. अरस्तु के नजर में काव्य और कला जीवन जीने तथा  आगे उससे अच्छे जीवन जीने का एक संस्कृति को जन्म देने वाली ज्ञान एवं विकास की परम्परा को विकसित करना चाहते है. विकास एवं ज्ञान के परम्परा में प्रकृति शुरूआती स्रोत है तो अनुकरण प्रकृति और जीवन को जोड़कर नये कल्पनाओं को, नये अवधारणाओं को और नये जीवन शौली का आधार बनाता है.


इस चर्चा में अमृत अर्णव, संदीप कुमार, दाक्षम द्विवेदी, एम. डी. आफताब हुसैन, डिम्पल भी सामिल थी.

Sunday, 23 August 2015

गांधी और तकनीक




महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गाँधी विचार मंच द्वारा चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रंखला के पांचवां सप्ताह में गांधी और तकनीक विषय पर चर्चा हुई जिसमें विकास एवं शांति अध्ययन विभाग के पीएचडी शोधार्थी सह गांधी विचार मंच के संयोजक नीरज कुमार ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण पर्चा इस प्रकार है.

गांधीजी, पूरा नाम मोहनदास करमचन्द्र गांधी, जिन्हें दुनियाँ व्यक्ति नहीं विचार के रूप में स्वीकार कर चुकी है, जो सत्य व अहिंसा के प्रतीक भी हैं - उन्होंने सत्य को सत्ता से मजबूत बनाया और अहिंसा को सम्पूर्ण मानवता का केंद्र के रूप में स्थापित किया। सत्य- साध्य है, लक्ष्य है तो अहिंसा उसका साधन है। प्रकृति में जितने भी जीव-जंतु हैं, उसमें जीवन है, जीवन के बिना ये अस्तित्वहीन हैं। इसमें समाज का पूरा जीवन, जो प्रकृति द्वारा लाखों-करोड़ों साल में तय की हुई चीजें आ सकती है। जीवन है तो तकनीक है यानी जीवन ही तकनीक है। इस प्रकार हम मानव समाज से तकनीक को अलग करके नहीं देख सकते है। जैसे खेती करना जीवन का लक्ष्य या साध्य है तो तकनीक हल-बैल और बीज हो सकता है। तलाब, नदी, कुआं आदि जल संरक्षण का प्राकृतिक तकनीक रहा है। जिसे आधुनिक तकनीक ने बर्बाद कर दिया है।
जबसे तकनीक को अलग करके हमने देखना शुरू किया है यानी हल के जगह ट्रेक्टर को लाया, तलाब को बचाया नहीं, साथ ही नदियों में पुल और डैम का निर्माण करना शुरू किया है, तबसे बाजार को बढ़ावा मिला है। जहाँ से प्राकृतिक जीवनशैली के जगह कृत्रिम जीवनशैली ने मानव समाज में स्थान बना लिया है। अर्थात जिसे मनुष्य ने मानक बना रखा था उसका महत्व बढ़ गया और जो जीवन मूल्य था उसका महत्व घट गया। जैसे रूपये-पैसे, सोने-चांदी या अन्य पदार्थ अनमोल हो गये और मानवीयता का कोई मोल ही न रहा। आज मशीन के बिना कोई काम संभव नहीं है। यूँ कहें, आज कोई भी क्षेत्र मशीनीकरण से अछूता नहीं है, बल्कि हर दिन नए-नए मशीनी तकनीक इजाद हो रही है। आज जिस तरह मशीन के प्रति आसक्ति बढ़ी है, गांधीजी ने इसी आसक्ति को पागलपन कहा था। वे इसके खिलाफ थे। इसलिए उन्होंने  समाज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली शिक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ते हुए बुनियादी तालीम की बात की थी। जिसमें मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ हृदय और हाथ के विकास का होना आवश्यक माना था क्योंकि उनकी नजर में मानव शरीर स्वयं में एक मशीन है। अगर शरीर से जीवन को अलग कर दिया जाय तो यह संवेदनहीन हो जायेगा, इसलिए उसकी संवेदनाओं को बनाए रखने के लिए हृदय को जागृत रखना जरुरी होता है। इसके लिए शरीरश्रम का होना निहायत ही आवश्यक माना गया है।
आज का आधुनिक विकास जो पूर्णतया मशीनों के द्वारा संचालित हो रही है, हमें संवेदनहीन के साथ-साथ बेरोजगार और जड़विहीन भी बना रहा है। जिसके कारण आज तरह-तरह की सामाजिक-मानसिक बीमारियाँ तेजी से फैलते जा रही है, जो लाइलाज है। जैसे - अनिद्रा, अकेलापन, अवसाद, अविश्वास और अनास्था। आज सवाल यह है कि जहां हम समय की गति के साथ तो बढ़े  हैं, वहीं अपनी गति को कम कर लिया है और इसके लिए कितनी तत्परता एवं अभिरूचि दिखाई है जिसका नतीजा हमारे सामने दिख रहा है। तकनीकी शिक्षा को लेकर भी हमारी सोच इन्हीं पहलुओं पर केन्द्रित है। गांधी की तकनीक पर सिर्फ चर्चा हो कर रह गई है वर्ना अब-तक गाँधी माडल दुनिया को इस सारी सामाजिक बीमारियों के दलदल में फसने नहीं दिया होता।
यह विकास मुट्ठी भर लोगों के लिए है। इस विकास में पर्यावण का विनाश हो रहा है – ए.सी., कल-कारखाने से निकलने वाली जहरीली गैसें हमारे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य का भी दुश्मन हैं। इस तकनीक के आने के बाद बेरोजगारी बढ़ गई। लोग पेट की खातिर गलत करने को मजबूर हो रहे हैं। परिवार टूट रहा है, पड़ोसी दुश्मन होते जा रहे हैं, प्रकृति रोज दोहन का शिकार हो रही है। परमात्मा को भुलाया जा रहा है यानी मानवीय आस्थाओं का गला घोंटा जा रहा है।
आज फिर से गांधीजी द्वारा बताये गये मूलभूत अवधारणा को आत्मसात करने की जरूरत है तथा उनके एकादश व्रत और रचनात्मक कार्यक्रम को वर्तमान सन्दर्भ के अनुसार पाठ करने की जरूरत है। जो इस प्रकार है - सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, असंग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद, सर्वत्र भय वर्जन, सर्वधर्म समानत्व, स्वदेशी, स्पर्श भावना। इन सारे बिन्दओं पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। वहीं रचनात्मक कार्यक्रम को भी आत्मसात करने की आश्यकता है। जो इस प्रकार है - कौमी एकता, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, खादी, दूसरे ग्रामउद्योग, गांवों की सफाई, नयी या बुनियादी तालीम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएँ, राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी, विद्याथी को चिन्हित किया गया था।
गांवों के लोग, आज भी उन सारी चीजों का उत्पादन कर रहे है, जिससे मानव और जीव जगत बचा है। फिर भी गाँव का महत्व दिनों-दिन ख़त्म होता जा रहा है। गाँव के द्वारा उत्पादित चीजों/वस्तुओं का महत्व शहरों में उत्पादित वस्तुओं के सामने फीका नजर आता है। टी.वी., फ्रीज, मोबाईल इत्यादि से भूख नहीं मिट सकती है, लेकिन महत्व इसी का है गेहूं, चावल आदि का नहीं।
                                                                                                                       नीरज  
चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच.डी, विकास एवं शांति अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि गांधी और तकनीक’,  तकनीक का अंग्रेजी में ‘technique’ होता है, जिसे प्रविधि भी कहा जाता है। यहाँ गांधी और तकनीक का मतलब गांधीजी के कार्य पद्धति से हुआ। गांधीजी के कार्य पद्धति को जानने से पहले गांधीजी के उद्देश्य को समझना जरूरी है। गांधीजी के उद्देश्य थे: अहिंसक समाज रचना, सर्वोदय समाज बनाना आदि। गांधीजी इस तरह के समाज रचना के लिए जो तकनीक इस्तेमाल किए वे थे: रचनात्मक कार्यक्रम, एकादश व्रत, विकेन्द्रीकरण, ट्रस्टीशिप, सत्याग्रह, ग्राम स्वराज इत्यादि। गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रम में 18 प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम रखे और समाज में रहकर उस पर काम किए। रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता, स्पृस्यता निवारण, शराब बंदी, खादी, दूसरे ग्रामो उद्योग, गाँव की सफाई, नई या बुनियादी तालिम, बड़ों की तालिम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियाम, प्रांतीय भाषा, राष्ट्र भाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदूर, आदिवासी, कोढ़ी, विद्यार्थी। एकादश व्रत का 1930 में मंगल प्रभात नामक पुस्तक में विस्तार से उल्लेख गांधीजी ने किया है। जिसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अभय, शरीर श्रम, स्वदेशी, स्पृस्यता निवारण, सर्वधर्म समभाव है। जिसको हर कोई इसे पालन अपने जीवन में करे। विकेन्द्रीकरण का सिद्धान्त केन्द्रीकरण से निजात दिलाने और गाँव की शक्ति को बढ़ाने के लिए उन्होंने दिया। ट्रस्टीशिप का अर्थ गांधीजी ने संपत्ति के रक्षक या रक्षण से लिया है। जिस तरह सूर्य की रोशनी पर किसी एक का हक नहीं है सभी को बराबर मिलता है। हवा भी सभी को बराबर मिलता है, उसी तरह जमीन पर भी सभी को बराबर हक मिलना चाहिए। संपत्तिवान सिर्फ संपत्ति का रक्षक है मालिक नहीं। सत्याग्रह गांधी का अस्त्र है समाज में मनुष्य की गलत मानसिकता या कार्य को परिवर्तन करने के लिए।
एम.फिल के सुरेश कुमार ने महाराष्ट्र के अहमद नगर के हिवडे बाजार गांव के विषय में बताया जहां गांधी के तकनीक विषयों को अपनाकर लोगों ने अपना जीवन सुखी बनाया है. गांव में लोग नशाबंदी और शराबबंदी  करके मेड़बंदी, जल संरक्षण,दाल आदि उत्पादन से सबंधित कुटीर उधोग स्थापित करके गांव को हराभरा और आर्थिक सम्पन गांव बना लिया है. उनका यह कहना यह बताता है कि गांधी के तकनीक संबंधी विचार आज भी प्रासंगिक है.
फिल्म और नाट्य से एम.फिल कर रहे कृष्ण मोहन कहते हैं, जब हम अपने शरीर के अंगों का विशिष्ट प्रयोग करते हैं तो वह भी तकनीक कहलाता है. तकनीक जीवन को आसान बनाता है. गांधीजी की भी तकनीक के इस पहलू को स्वीकार करते हैं. वह जो चरखा आदि का प्रयोग करते थे. वहां भी तकनीक था. हम विकास को रोक नहीं सकते हैं लेकिन उसका स्वरूप जरूर निर्धारित कर सकते हैं. कम्प्यूटर का उपयोग हमें निर्धारित करना होगा. हम वैज्ञानिक शोध में कम्प्यूटर के प्रयोग को नहीं नकार सकते हैं. फेसबुक पर दूर देश में बैठे अपने मित्र से जरूरी बात करते हैं वह सही है लेकिन अगर हम बगल के कमरे के मित्र से बातचीत के लिए फेसबुक का सहारा लेते हैं तो वह गलत है. इसी तरह स्वास्थय क्षेत्र में गंभीर बिमारी के इलाज में एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग को नकार नहीं सकते हैं, पर हल्की बिमारी में तुरंत उसका प्रयोग सही नहीं माना जा सकता है.
जे.सी.बी मशीन 25 लोगों का काम कर सकता है लेकिन हमें निर्धारित करना होगा कि इसका प्रयोग कहां करे अगर हम सामान्य जगह पर उसका प्रयोग करते हैं तो वह गलत और मानवता के हित में नहीं हैं.वास्तव में सारी स्थितियों के निर्धारक हम स्वंय हैं जो हमारी नैतिकता से परिचालित होती है. सबके केन्द्र में नैतिकता ही है. विज्ञान वरदान भी है और अभिशाप भी है. उसे वरदान या अभिशाप हम ही बनाते हैं. तकनीक अगर आग है तो हम उससे चुल्हा जलाएं या घर को ही आग में झोंक दे, यह हमारे निर्णय पर निर्भर करता है. उनका मानना है कि विज्ञान या तकनीक का असंतुलित प्रयोग गलत है. गांधी जी तकनीक के संतुलित प्रयोग के पक्षधर थे जिसमें मनुष्य की उपेक्षा नहीं होती है. मनुष्य को उपेक्षित करके तकनीक को बढ़ावा देना उनकी समझ में मानवता को विनाश की ओर ढकेलना है.
एक अन्य सज्जन मुन्ना जी कहते हैं गांधी जी ने औधोगिक क्रांति के विरूद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास किया तो वहीं विकास जी ने इस बात से सहमति जताई की गांधी जी तकनीक के खिलाफ नहीं थे बस  जरूरत के हिसाब से और सीमित प्रयोग को स्वीकार करते थे.


स्त्री अध्ययन से एम.फिल. कर रहे नवनीत कहते हैं कि गांधी के तकनीक प्रकृति के अनुकुल है जैसे मटका जो पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध करता है और मौसम के अनुसार पानी को उतना ही शीतल करता है जितना आपके शरीर को चाहिए होता है.फिर घर में मटका का होना सादगी का प्रतीक भी तो  है. मिट्टी के लेप का गांधी जी खूब इस्तेमाल करते थे और दूसरो को भी इसका उपयोग करने के लिए कहते थे. जिसके बारे रोहित जी ने बताया कि कई लोगों के साथ महादेव देसाई ने भी गांधी जी के इस प्रयोग का इस्तेमाल स्वस्थ होने के लिए किया था जो आज प्राकृतिक उपचार के नाम से जाना जाता है. फिर अंत में  मंच के संयोजक नीरज कुमार कहते हैं कि गांधी जी सत्य को लक्ष्य और अंहिसा को साधना मानते हैं. जीवन ही तकनीक है हमारा तकनीक ऐसा होना चाहिए जो हमें नैतिक और स्वालंबी बनाए तथा प्रकृति से जोड़ें रखे. वो कहते हैं कि यर्थाथ तो विज्ञान के साथ है पर मशीन मनुष्य का काम छीन रही है. विज्ञान और प्रकृति का संतुलन मनुष्य को केन्द्र में रख कर किया जाए रूढ न बनाया जाए. आगे उनका कहना है शांति को युद्ध जीत कर नहीं बल्कि मानवता को स्थापित करके लाया जा सकता है. जो सिर्फ अहिंसा के माध्यम से लाया जा सकता है.

Thursday, 13 August 2015

साप्ताहिक,चतुर्थ परिचर्चा : महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता




महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गाँधी विचार मंचद्वारा चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रंखला के चौथे सप्ताह में महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता विषय पर चर्चा हुई जिसमें प्रदर्शनकारी कला (फिल्म और नाटक) विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत कृष्ण मोहन ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण पर्चा इस प्रकार है.
महावीर, बुद्ध और गांधी की अहिंसा की वर्त्तमान प्रासंगिकता
भारत में तीन महापुरुष, महावीर, बुद्ध और गांधी ऐसे हुए हैं जिनके विचारों में अहिंसा का आधार स्पष्ट दिखाई पड़ता है. महावीर और बुद्ध को ईश्वर का दर्जा प्राप्त है तो गाँधी को हमने महात्मा तक ही सिमित रखा है. जैसा कि इतिहास बताता है महावीर और बुद्ध के जीवन में चमत्कारिक घटनाएं हुई शायद इसलिए वे भगवान माने जाने लगे. उनकी अहिंसा आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गई लेकिन गाँधी के साथ ऐसा नहीं हुआ. महावीर और बुद्ध धर्म प्रवर्तक बने और गाँधी समाजसुधारक माने जा सकते हैं.
जैन धर्म में अहिंसा कठिन व्रत की तरह है. बौद्ध धर्म में मध्यम मार्ग के कारण अहिंसा का प्रभाव अपेक्षाकृत बहुत बड़े जनसमुदाय पर पड़ा. इस धर्म से प्रभावित होकर मध्य एशिया की विकराल रक्तपिपासु जातियां अहिंसक बनीं. आधुनिक समय में गांधी ने भी अहिंसा का संबल प्राप्त किया और बड़ी-बड़ी उपलब्धि पाई. गाँधी की अहिंसा सबसे अधिक व्यव्हार की धरातल पर उतरी और किसी-न-किसी रूप में सम्पूर्ण विश्व में चर्चित हुई. गांधीजी ने एक नई बात कही कि अहिंसा सामाजिक धर्म हो सकती है और पहली मान्यता के विपरीत समाज से व्यक्ति तक पहुँचाने की बात भी कही. महावीर, बुद्ध और गाँधी की अहिंसा के स्वरुप में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता है लेकिन व्यवहारगत थोडा-बहुत अंतर तो है ही.
महावीरस्वामी की अहिंसा करुणा की स्थापना पर बल देती है. उन्होंने अहिंसा का सहारा लेकर तत्कालीन पुरानी रूढ़ियों को उलटने का प्रयास किया. बुद्ध ने भी ऐसा ही किया. गाँधी ने अहिंसा के अपने सिद्धांत के माध्यम से अपने पूर्ववर्ती महावीर और बुद्ध के लक्ष्य को ही पाने का प्रयास किया. वह लक्ष्य है मानवता का कल्याण जिसके आधार बनते हैं - प्रेम और त्याग.
वस्तुतः अहिंसा तथ्यात्मक रूप से एक ही है. बस उसके अनुप्रयोग की व्याख्या में अंतर के कारण हम महावीर की अहिंसा, बुद्ध की अहिंसा और गाँधी की अहिंसा नाम से अभिहित करते है. तीनों महापुरुषों के सिद्धांतों में अहिंसा ही केंद्र में है. अन्य तत्त्व अहिंसा को ही स्थापित करने में सहायक होते है. जैसे, जैन के सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह; बौद्धों के पंचशील और गाँधी के लगभग दस अन्य तत्त्व, सभी अहिंसा को स्थापित करने वाले तत्त्व है. लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि मानवता के सुख का मूल अहिंसा को स्थापित करने वाले तीनों आचार्यों के विचारों का बहुत ज्यादा फायदा हमे नहीं मिला. जैन धर्म अपनी कठिनता के चलते बहुप्रचारित नहीं हुआ; बौद्ध धर्म दो सम्प्रदायों में बंटा और हिन्दू कर्मकांडों जैसे आयोजनों को स्वीकार कर लिया. आधुनिक काल में बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया लेकिन वर्तमान में उनके अनुयायी इसे प्रतिशोध का अस्त्र बनाने पर तुले है जो करुणा और सहिष्णुता की भावना से कोसो दूर नजर आती है. यही भावनाएं बौद्ध धर्म का आधार थी. अब रही बात गाँधी की तो हमने उनकी हत्या ही कर डाली. 60-70 साल में ही यह लगता है कि उनके विचार और उपलब्धियां किसी और युग की बात है. अब हम सिर्फ उनके जन्म और मरण की वर्षी भर मानते है. लेकिन जब अन्नाहजारे जैसे लोग दिल्ली सिंघासन को हिलाते है तो यह परिघटना ऐसी ही अन्य ऐतिहासिक जानकारियों से मिलकर उन महापुरुषों की अहिंसा के सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता पर सोचने को विवश करते है.
अहिंसा की सूक्ष्म परिभाषा में उलझने के बजाय हम मोटे तौर पर भी सोचें तो यह बात सामने आती है कि अहिंसा का मतलब है, किसी भी जीव को शारीरिक, मानसिक क्षति नहीं पहुचाना; त्याग और प्रेम की स्थापना; मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट नहीं देना. अगर हम मन, वचन और कर्म से या फिर उनमें से किसी एक से भी दूसरे जीव को कष्ट पहुंचाते है तो वह पाप है. वर्तनाम समय में पाप और पुण्य की परिभाषा ही बदलती जा रही है पर विवाद का स्वरूप नहीं. सूक्ष्मता की आवश्यकता नहीं है सामान्य रूप से भी हम समझ सकते हैं कि सभी समस्याओं की जड़ में हिंसा ही है. आज सम्पूर्ण विश्व में जो युद्ध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, यौन अपराध, जातीय अस्मिता के झगड़े आदि सभी के जड़ में हिंसा ही है. अतः इन समस्याओं का समाधान अहिंसा से ही हो सकता है. इसलिए वर्तमान समय में अहिंसा की प्रासंगिकता तो है ही. सिर्फ वर्तमान समय में ही नहीं इतिहास की घटनाओं और भविष्य की संभावनाओ को देखकर यह आसानी से कहा जा सकता है कि अहिंसा की सर्वकालिक प्रासंगिकता है चाहे हम इसे अपने जीवन में उतार पाएं या नहीं.
खासकर गाँधी की अहिंसा सबसे अधिक व्यव्हार का आधार ग्रहण करती है इसलिए यह महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध की अहिंसा के सिद्धांतों से ज्यादा प्रासंगिक है.
—   कृष्ण मोहन.
पर्चा पठन के बाद हुई परिचर्चा में उपस्थित शोधार्थियों-विद्यार्थियों में से कुछ लोगों ने उल्लेखनीय टिप्पणी कि जो निम्न प्रकार है.
चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच.डी, विकास एवं शांति अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि जैन धर्म ने अहिंसा की गहराई को बताने का काम किया है लेकिन जटिलता के चलते आम जीवन में अपनाना बहुत मुश्किल है. बौद्ध धर्म में अहिंसा को लचीला बनाते हुए मध्यम मार्ग का रास्ता दियागया है वहीं गांधीजी ने अहिंसा को समाज के लिए सर्वव्यापि बनाते हुए आम जीवन में अहिंसा के महत्त्व को बताया है. गांधीजी अहिंसा का पालन मन, वचन और कर्म से करने की बात कहते है. गांधीजी की अहिंसा प्रेम का दर्शन है. गांधीजी सत्य की प्राप्ति के लिए अहिंसा को आवश्यक मानते है. वे कहते है कि, जब में सत्य को खोजता हूँ तो अहिंसा कहती है कि मेरे द्वारा खोजो और जब में अहिंसा को खोजता हूँ तो सत्य कहता है मेरे द्वारा खोजो. इस तरह गांधीजी सत्य और अहिंसा की तुलना ऐसे चकती से करते है जहाँ यह कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा भाग अहिंसा है और कौन सा भाग सत्य. दोनों में अन्योनाश्रय संबंध है. गांधीजी के आश्रम में एक बछड़े के बीमार होने और इलाज कराने पर भी ठीक नहीं होने पर गांधीजी उसके कष्ट को सहन नहीं कर पाए और जहर की सुई देकर मारने की बात करते है. इससे जाहिर होता है कि गांधीजी की अहिंसा में कष्ट को देखना हिंसा है.
राकेश आनंद (पी-एच. डी., बौद्ध अध्ययन) ने टिपण्णी करते हुए कहा कि, काया, वाणी एवं मन से किया हुआ कर्म जो स्वयं में तथा दूसरों को भी कष्ट नहीं पहुंचाता है उसे अहिंसा कहते है. आगे बुद्ध कहते है कि जिस प्रकार माता अपने एकलौते पुत्र को प्यार करती है उसी प्रकार इस पृथ्वी पर सभी जीवों के प्रति मैत्री करनी चाहिए ना किसी को मारे ना किसी के द्वारा मरवावे. अहिंसा का मतलब ही होता है मैत्रीपूर्वक व्यवहार करना. जहां पर धर्म, संप्रदाय, जाति तथा यहाँ तक कि देशवाद से भी ऊपर उठकर मानव कल्याण के बारे में चिंतन-मनन करना. इसका उदाहरण महाराजा अशोक के शासन काल में देखी जा सकती है. उन्होंने मानव के साथ-साथ पशुओं के भी औषधालय खुलवाए तथा पेड़-पौधों लगवाकर के निसर्ग का संरक्षण किया तथा युद्ध से नहीं मानव के ह्रदय परिवर्तन से अहिंसा के मार्ग पर बढे. बुद्ध कि अहिंसा मनोवाचिक पर विशेष जोर देता है. क्योंकि सभी दुःख एवं सुख का अनुभव मन ही करता है. इसलिए मन को संवर किया जाए तो सभी दुखों से मुक्ति पा सकते हैं. जब तक आप अपने जीवन सदाचरण का पालन नहीं करते तब तक चित्त की प्रवृत्ति हिंसात्मक ही बनी रहती है इसलिए बुद्ध ने पंचशील का सिद्धान्त दिया जिसमें पहला ही शील है मैं किसी भी प्राणी का हिंसा नहीं करूंगा. तथा सादगी सौहार्द पूर्वक सभी के साथ व्यवहार करूंगा. दूसरा शील में मैं चोरी नहीं करूंगा. बिना पूछे किसी का सामान नहीं लेना. तीसरा मैं अनैतिक संबंध नहीं स्थापित करूंगा. चतुर्थ मैं झूठ, निंदा, चुगली, व्यर्थ कि बड-बड बातें नहीं करूंगा, पांचवां मैं किसी भी प्रकार का मादक द्रव का सेवन नहीं करूंगा. इस प्रकार नीति शास्त्र परख सिद्धान्त देकर बुद्ध ने अहिंसात्मक प्रवृत्ति का समाज को मार्गदर्शन किया. अंगुलीमाल डाकु को जिन्होंने ९९९ मनुष्यों का वध करने वाला अपने अहिंसात्मक प्रवृत्ति से उसका मन परिवर्तन करके उसे दानव से मानव बना दिया.
साहित्य विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत रमेश कुमार राज ने कहा, महावीर और बुद्ध दोनों महापुरुष मजबूती के साथ वर्ण आधारित वर्तमान समाज का विरोध कर अपनी बात रख सके। इनके समय में ब्राह्मण कर्मकांड अपने चरम पर था। वैदिक धर्म की आड़ में ब्राह्मण समाज का जबर्दस्त शोषण कर रहे थे। अश्वमेध और पुरुषमेध जैसे यज्ञ के नाम पर पशुओं और और नरों  की बलि दी जा रही थी। संभवतः यही से इन महापुरुषों के मन में अहिंसा का भाव पैदा हुआ होगा। उस समय इस हिंसा के विरोध का सीधा-सीधा मतलब वैदिक धर्म और ब्राह्मणवादी कर्मकांड के अस्वीकार करने से था। इसलिए दोनों ने ब्राह्मण के अनेक तत्वों का विरोध भी किया। वेदों को अकाट्य प्रमाण नहीं माना। लगभग दोनों ने ही इस बात पर जोर दिया कि वैदिक धर्म हीन विद्या है और किसी भी तथ्य को व्यक्तिगत परीक्षण के बाद ही स्वीकार करना चाहिए न कि परंपरागत मान्यताओं के आधार पर। बुद्ध ने यह बताया भी कि वेदमंत्र जलविहीन मरुस्थल और पंथहीन जंगल है। इसलिए उन्होंने यज्ञ का विरोध किया और बताया कि यज्ञ में जीवों का विनाश पाप है। इसीलिए महावीर ने जिन पाँच महाव्रतों का और बुद्ध ने जिन दस शीलों के पालन का उपाय बताया उसमें अहिंसा समान रूप से विद्यमान है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इनकी अहिंसा विषयक अवधारणा व्यक्तिक से सामाजिक की ओर अग्रसर हो रही थी।
अब जहां तक गांधी जी की ‘अहिंसा’ विषयक अवधारणा की बात है तो इसके बारे में यह कहा जा सकता है कि यह समाज से राष्ट्र और राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय की ओर अग्रसर प्रतीत होती है। क्योंकि जिस समय गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे वह ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रथम विश्वयुद्ध का दौर था और गांधीजी ने इस बात को बड़ी गहराई से महसूस किया कि इस युद्ध में हमने क्या खोया और क्या पाया है। इस युद्ध ने कई देशों के अस्तित्व को खत्म कर दिया था। राष्ट्र लोलुपता आदमी को आदमी का दुश्मन बना रहा था। धर्म के नाम पर सांप्रदायिक दंगे शुरू हो रहे थे और जो कमजोर थे वह फिर उठ खड़े होने और संघर्ष करने के प्रयास में थे। द्वितीय विश्वयुद्ध का होना इसी संघर्ष का परिणाम है। इसलिए दूसरा महायुद्ध न हो, इसके लिए जिस बड़े हथियार का गांधीजी ने इस्तेमाल किया वह ‘अहिंसा’ है। लेकिन गांधीजी  की यह पराजय ही कहा जाना चाहिए कि द्वितीय महायुद्ध को वे रोक न सके। अतः गांधीजी के अहिंसा को न केवल भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक पक्षों को ध्यान में रखते हुये व्यापक धरातल पर सोचने और समझने की आवश्यकता है।

नवनीत कुमार, एम.फिल. स्त्री अध्ययन, ने कहा, जैन धर्म के त्रिरत्न हैं सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक आचरण. त्रिरत्न के अनुशीलन में पाँच महाव्रतों में अहिंसा की भी बात कही गई है. इस अहिंसा में सुक्ष्म हिंसा से भी बचने पर जोर दिया गया है. जिसको अक्षरश: पालन करना अंसभव है जैन धर्म की यह विशेषता हो सकती है. पर जैन धर्मी इस सुक्ष्म हिंसा से अपने आपको कितना बचा पाते हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है? जैन धर्म की अहिंसा को आज के भौतिक जीवन से जोड़कर देखने पर लगता है कि यह सिर्फ कहने की बात हो सकती है। बहरहाल जब हम इस अहिंसा को बौद्ध धर्म के बनाए दस शीलों पर रखकर देखते हैं तो मुझे लगता है कि जैन धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म में जो अहिंसा की बात कही गई है वह कहीं ज्यादा आत्मसात करने योग्य लगती है. जैसा कि भगवान बुद्ध ने जब अंगुलीमाल से कहा कि वह पत्ता जो तुम तोड़कर लाए हो उसको पुन: जोड़कर आओ तो वह डाकू अंगुलीमाल सीदे शब्दों में कहता है डाल से टूटा हुआ पत्ता कभी भला जुड़ सकता है क्या, मानो वह भगवान बुद्ध को ही समझा रहा हो कि आप मुर्ख हैं क्या ...इसलिए बुद्ध की शिक्षा जैन धर्म की तुलना में कहीं ज्यादा सरल लगती है. जब हम गांधी की अहिंसा की बात करते हैं तो मुझे लगता है कि लोक जीवन में उनकी बातों को अमल में लाया जाए तो उसका तुंरत असर दिखता है, उन्होंने अहिंसा को बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, के जरिए  आत्मसात करने को कहते हैं ये तीनो बातें बहुत ही सरल हैं. 
अंत में मंच के संयोजक नीरज कुमार ने कहा कि महावीर (जैन धर्म ) द्वारा प्रतिपादित अहिंसा मनुष्य को विरक्ति की ओर ले जाती है. चूँकि इनकी अहिंसा में खान-पान से लेकर सभी तरह के सुक्ष्म अहिंसा की बात कही गई है जो साधारण मनुष्य द्वारा  पालन कर पाना संभव नहीं है. क्योंकि मनुष्य जब किसी प्रकार की जैविक क्रिया करेंगे, तो उस वक्त सूक्ष्म हिंसा होना स्वभाविक हो जाता है. अत: इसे पालन कर पाना जीव जगत में संभव नहीं है.
बुद्ध की अहिंसा को देंखे तो वहां स्पष्ट तौर पर यह दिखता है कि जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकता हूँ तो उसका जीवन लेने का हमें कोई अधिकार भी नहीं बनता है. फिर क्यों उसके जीवन से जुड़े अधिकारों को बाधित करूँ, बुद्ध के अहिंसा का विचार से मनुष्य की चेतना का निर्माण होता है. यहाँ इनके विचार मन, वचन और कर्म में एकरूपता लाता है.
जबकि गाँधी की अहिंसा वर्तमान समय के सभी आयामों को जोड़ते हुए जैसे, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन शैली को प्राकृतिक जैविकता के आधार पर संरक्षित करने की बात करती है. जहाँ एक ओर अंतरराष्ट्रीयता पर बल प्रदान करती है तो वहीं मानवता के दिशा में बढ़ती हुई दिखती है. गाँधी अहिंसा की बात करते हुए यह कहते हैं हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है और अहिंसा प्रेम दया और करुणा को जन्म देती है. इसे हम इस रूप में समझ सकते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध को जन्म दिया. जहाँ एक और द्वितीय विश्वयुद्ध का नेतृत्व कर रहे दुनियां के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर ने हिंसा के सहारे दुनियां को बदलना चाहा वहीं दूसरी ओर अहिंसा के माध्यम से दुनियां को नष्ट होने से बचने की बात गाँधी कर रहे थे. भारतीय दर्शन में अहिंसा का विचार पूर्व से विद्यमान था, जिसे गाँधी ने  नया आयाम दिया.  इस आधार पर महावीर और  बुद्ध के इस दर्शन को व्यापक फलक पर लाने में गाँधी ने जो काम किया है वह आज भी प्रसांगिक है.