महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के ‘गाँधी विचार
मंच’ द्वारा
चलाये जा रहे समूह अध्यन चर्चा श्रृंखला के छठे सप्ताह में ‘अरस्तू’ के विचार और
दर्शन पर
चर्चा हुई जिसमें स्त्री अध्ययन विभाग के एम.फिल. में अध्ययनरत नवनीत कुमार ने पर्चा पढ़ा. सम्पूर्ण
पर्चा इस प्रकार है.
अरस्तु पर पर्चा तैयार करते समय मेरे मन में यह चलने लगा ये
कौन है,क्या है ये, क्यों हैं ये, कहां है ये, कब...ये तमाम विचार मेरे मन में
घुमने लगे. अरस्तु एक मानव था जिसके अपने
देखने का नजरिया था जिसके अपने दर्शन
थे .... नवनीत तुम क्या हो जो पहले अरस्तु
बोलते हो फिर देखने का नज़रिया फिर दर्शन .... हां मैं ठीक तो बोल रहा हूं देखने
के नजरिया जिसको दर्शन कहते हैं मैं इसे सरल भाषा में कहता हुं कि जैसे प्यार क्या
है तो हमलोग कहते है कि एक लड़का जो किसी लड़की से प्यार करता है एक लड़की जो एक
लड़का से प्यार करता है इसी को प्यार कहते हैं. पर अरस्तु ने कहा प्यार के बारे में कहा प्यार एक ही
आत्मा से बना है जो दो शरीर में बसता है Love is composed of a single soul inhabiting two bodies.
ये उनका दर्शन या देखने का नज़रिया है....
तो मुझे लगता है कि अरस्तु के बारे में चर्चा करने से पहले दर्शन के बारे में
चर्चा हो जाए ये देखने का नजरिया का क्या है जिसे लोग भद्र लोग दर्शन कहते हैं..
जहां दर्शन की बात होती है वो दर्शनशास्त्र... और...जिनकी दर्शन की बात हम लोग
करते हैं, वे दार्शनिक कहलाते हैं...ये दार्शनिक किसी भी वस्तु को के बारे में
सवाल करना फिर उस सवाल की खोज करना .. जैसे सत्य की प्रकृति क्या है
...............................................................ये सवाल किसी भी
विषय में हो सकता हैं.... जैसे......
X
ज्ञान मीमांसा,Epistemology (Question about Knowledge).
X
अध्यात्मविज्ञान Metaphysics (Time, Space, God, Cause, and Reality)
X
नीति Ethics (Good and Bad)
X
सौंदर्यशास्र Aesthetics (Art and Beauty)
X
राजनिति Political Philosophy
अरस्तु प्रश्न करते हैं आखिर पेड़-पोधा एक
ही जगह पैदा होते हैं वहीं जीवन खत्म हो जाता है एक जगह से दूसरे जगह क्यों नहीं
जाते हैं...फिर अरस्तु प्रश्न करते हैं कि कैसे अंडे में चूजा का कैसा विकास हो
जाता है? ... अरस्तु के नीति के चार दार्शनिक सवाल थे.....
पहला – ऐसा क्या है जो मनुष्य को खुश रखता
है?
- झगरालू------मित्रता-----चापलूसी
· बेशर्मी(shamelessness)----------शील(Modesty)---------शर्म(Shayness)
· कायरता------ साहस----------आतुरता
दूसरा- कला क्या है ? कला क्यों बना है?
कला का मतलब है कि जैसे जीने का मतलब सिखाता
है...जैसे आपके लाइफ में कोई आपदा आई हो और आप इतना टूट गए कि आप अपने जीवन को ही
खत्म करना चाहते हैं तो कला ही आपको एक सकारात्मक विचार देता है.... जैसे कोई
मनुष्य ये मान लेता है कि मैं कमजोर
व्यत्ति हूं मैं किसी से भी जीत नहीं सकता हूं तो क्या होगा उसके सामने चींटी भी
आएगीं तो डर जाएगा लेकिन उसी व्यत्ति को
कोई ऐसा नाटक,उपन्यास,सिनेमा प्रतिदिन दिखाया जाए... तो वो एक दिन इतना मजबूत हो
जाएगा कि उसके सामने कोई सांप आ जाए या कोई WWWF का पहलवान उसे भी हारने में वो सक्षम हो
जाएगा...
तीसरा- दोस्ती क्या है दोस्त कौन हैं
क्यों हैं?
दोस्ती तीन तरह की होती है
·
वो जो जिसमें आप किसी के होने
की खुशी मना रहे होते ....जैसे आप कबड्डी मैंच देख रहे हैं और आपके साथ कई लोग
उसका चेयर कर रहे हैं....वो भी एक दोस्ती है जहां उस टीम के जीतने का खुशी आप मना
रहे होते हैं........
·
दूसरी दोस्ती वो होती है जो
किसी के साथ होने से आप खुश होते हैं जैसे आप एक क्रिकेटर है और आप धोनी को अपना
प्रिय मानते हैं तो अगर धोनी के साथ है तो
आपको वह खुशी महसूस होगी... या आप राजनैतिज्ञ है तो आपको अपनी पार्टी के शीर्ष
नेता के साथ होना आपको खुशी देगा...
·
तीसरी दोस्ती वो होती है
जिसमें आप एक दूसरे में इतना घुले मिल गए होते
हैं आपका हार उसकी जीत या उसकी जीत या आपकी हार कोई मायना नहीं रखता
है..उसका दुख आपका दुख उसकी खुशी आपकी खुशी.....कोई फर्क नहीं पड़ता .....आप दोनों
के बीच मैं का अह्म नहीं रहता.....
चौथा - आप अपने विचारों को इस वयस्त लाइफ
में कैसे काटते हैं?
जैसे विद्धान एक पहलवान से पस्त हो जाता है मतलब कि वह पहलवान उस
विद्धान की विद्दता को टिकने ही नहीं देता है..इसलिए अरस्तु का कहना है कि विचार का ये मतलब नहीं है
कि इसको सही साबित करने के लिए किसी विचार के उपर थोप दो.... ये मतलब नहीं हुआ कि आप विचार का युद्ध करवा कर
किसी पर जीत हासिल कर सकते हैं .. अरस्तु
कहते हैं कि आपके विचार पर कितने लोग सहमत है कितने लोग असहमत है फिर आपके विचार
सहीं हैं या फिर गलत हैं.... इसलिए अरस्तु
कहते हैं कि किसी विचार को आम लोगों के बीच में रख ही कुछ निर्णय लेना चाहिए......
आज क्या हो रहा है हमलोग गुस्सा कर रहे
हैं ,आपस में बातों ही बात में झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को मार रहे हैं सबकुछ गढ-मढ
होते जा रहा है किसी तरह का कोई अनुशासन नहीं रह गया है, दर्शन के दिन-प्रतिदिन के
जीवन में कोई मायना नहीं रह गया है ... लेकिन जो मनुष्य किसी के दर्शन पर चलते
हैं तो उनके जीवन में सबकुछ सही होता है
ये दर्शन सफलता का रास्ता दिखलाता है,जीने
की कला सिखाता है अच्छे बुरे की पहचान बतलाता
है विषय पर व्यापक ज्ञान देता है....इसी के साथ मैं अपनी बातों को रोक रहा
हूं...मुझे आपके चहरे की मुस्कान से लग रहा है कि मैं अपनी बातों को समझाने में
सफल रहा हूं..ईमानदारी से मैं एक बात कहना चाहता हूं... मैंने यहां जो भी अरस्तु या दर्शन की बात किया...सिर्फ
प्रंराभिक ज्ञान है क्योंकि मुझे दर्शन के
शुन्य ज्ञान हैं...इसलिए मैं आप सभी का आभारी हूं... कि आपने मुझे मौका दिया....
साथ ही मैं एक बात बताना चाहता हूं कि शायद ही मैं कभी पब्लिक फोरम में कुछ बात रखा
हूं .... पब्लिक लाइफ रही है लेकिन मैं खुद में रहना पंसद करता हूं...ज्यादा
दोस्त....ज्यादा बातें मुझे पंसद नहीं है......बोलने से ज्यादा में सुनने में
ध्यान देता हूं.... किसी भी विषय का सूक्ष्म अध्ययन मुझे अच्छे लगता है....
धन्यवाद....
सुरेष डूडवे, एम.फिल., हिंदी एवं तुलनात्म साहित्य विभाग अरस्तु यूनानी दार्शनिक थे। उनका जन्म
स्टेगेरिया नामक नगर में सन 384 ईसा पूर्व में हुआ था। व उनका निधन 322 ईसा पूर्व में हो गया था। अरस्तु ने
भौतिक, अध्यात्म, कविता, नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनीति शास्त्र , नीतिशास्त्र, जीवविज्ञान सहित कई विषयों पर रचना की।
·
अरस्तु ने अपने गुरू प्लेटो
के कार्य को आगे बढ़ाया।
·
प्लेटो, सुकरात और अरस्तु
पश्चिमी दर्शनशास्त्र के सबसे महान दार्शनिकों में से एक थे। उन्होंने पश्चिम
दर्शनशास्त्र पर पहली व्यापक रचना की जिसमें नीति, तर्क, विज्ञान, राजनीति और अध्यात्म
का मेलजोल था।
·
भौतिक विज्ञान पर अरस्तु के
विचार ने मध्ययुगीन शिक्षा पर व्यापक प्रभाव डाला और इसका प्रभाव पुनर्जागरण पर भी
पड़ा। अंतिम रूप से न्यूटन के भौतिकवाद ने इसकी जगह ले लिया।
अरस्तु के अनमोल विचार
·
मनुष्य प्राकृतिक रूप से
ज्ञान की ईच्छा रखता है।
·
सभी भुगतान युक्त नौकरियां
दिमाग को अवशोषित और अयोग्य बनाती है।
·
डर बुराई की अपेक्षा से
उत्पन्न होने वाला दर्द है।
·
मनुष्य के सभी कार्य इन
सातांे में से किसी एक या अधिक वजहों से होते है- 1. मौका 2. प्रकृति 3. मजबूरी 4. आदत 5. कारण 6. जुनून 7. ईच्छा
·
कोई भी उस व्यक्ति से प्रेम
नहीं करता जिससे वो डरता है।
·
बुरे व्यक्ति पश्चाताप से भरे
होते है।
·
कोई भी क्रोधित हो सकता है यह
आसान है लेकिन सही व्यक्ति सही सीमा में सही समय पर और सही उद्देश्य के साथ सही
तरीके से क्रोधित होना सभी के बस की बात नहीं है और यह आसान नहीं है।
·
मनुष्य अपनी सबसे अच्छे रूप
में सभी जीवों में सबसे उदार होता है लेकिन यदि कानून और न्याय ना हो तो सबसे खराब
बन जाता है।
·
संकोच युवाओं के लिए एक आभूषण
है, लेकिन बड़ी उम्र के लोगों के लिए धिक्कार।
·
जो सभी का मित्र होता है वो
किसी का मित्र नहीं होता है।
·
चरित्र को हम अपनी बात मनवाने
का सबसे प्रभावी माध्यम कह सकते है।
·
लोकतंत्र तब होगा जब गरीब व्यक्ति
ना कि धनाड्य शासक हो।
·
शिक्षा बुढ़ापे के लिए सबसे
अच्छा प्रावधान है।
·
उत्कृष्टता वो कला है जो
प्रशिक्षण और आदत से आती है। हम इसलिए सही कार्य नहीं करते है कि हमारे अंदर
अच्छाई या उत्कृष्टता है, बल्कि वो हमारे अंदर इसलिए है क्योंकि हमने सही कार्य किया है। हम वो है जो हम
बार-बार करते हैं इसलिए उत्कृष्टता कोई कार्य नहीं बल्कि एक आदत है।
चन्दन कुमार (एस आर एफ, पी-एच. डी., विकास एवं शांति अध्ययन विभाग) ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए
कहा कि, अरस्तू को राजनीति शास्त्र
का जनक से जानते है, लेकिन अरस्तू दास प्रथा के
उत्प्रेरक भी रहे है। अरस्तू प्लेटो के शिष्य थे, 20 वर्षों तक शिक्षा पायी थी। अरस्तू का जन्म मेसीडोनिया सागर के किनारे
स्थित स्टेगिरा नामक ग्रीक उपनिवेश में 384 ईस्वी पूर्व में हुआ था। अरस्तू की
महानता हमें उनके जीवन में नहीं देखने को मिलती है, उनकी लेखन कृतियों में देखने को मिलती है। अरस्तू का मानना है कि, जो समाज में नहीं रहता वह देवता है अथवा दानव। अरस्तू ने
राज्य की उत्पत्ति के तीन चरण बताए हैं। पहला, परिवार एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि राज्य के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया में परिवार
पहली इकाई है। दूसरा, गाँव एवं राज्य की उत्पत्ति, जिसमें उनका मानना है कि, राज्य की उत्पत्ति में गाँव दूसरा स्तर है। तीसरा, राज्य, जिसमें उनका मानना है कि, विकास की इस प्रक्रिया में तीसरा चरण राज्य का होता है। जब
कई गाँव इकट्ठे होते हैं तब राज्य का निर्माण होता है। राज्य के स्वरूप के बारे
में अरस्तू का मानना है कि, राज्य एक स्वाभाविक संस्था
है, राज्य का स्थान परिवार से
पहले है, राज्य एक सर्वोच्च व
आत्मनिर्भर समुदाय है, राज्य का स्वरूप जैविक है।
राज्य के उद्देश्य के बारे में अरस्तू का मानना है कि, राज्य का अस्तित्व केवल जीवन के लिए नहीं, वरन अच्छे जीवन के लिए है। कई विद्वानों ने अरस्तू के
राज्य विषयक मूल्यांकन किया है, जिसमें मानना है कि, परिवार को मानव संगठन की पहली इकाए मानना त्रुटिपूर्ण है।
परिवार का उद्भव बाद में हुआ जब लोगों में सार्वजनिक नैतिकता की भावना पैदा हुई और
उन्होंने उस प्रारंभिक जीवन के ढंग को त्याग दिया, जिसमें स्त्री व पुरुष पशुओं की तरह परस्पर मिलते थे। आकस्मिक व अस्थायी
संसर्ग करके यह जाने बिना अलग हो जाते थे और बाद में इसका कोई पता नहीं रहता था कि
उससे संसर्ग से होने वाली संतान के माता-पिता कौन थे। राज्य को मानव शरीर ही मान
लेना अनुचित है। राज्य की वेदी पर व्यक्ति का बलिदान करना अरस्तू की भूल है। राज्य
के उद्देश्य व कार्य संबंधी विचार अस्पष्ट हैं। दासता संबंधी अरस्तू के विचार
अमानुषिक एवं प्रतिक्रियावादी हैं। अरस्तू मानते है कि, प्रकृति द्वारा कोई भी बेमतलब काम नहीं किया जाता है।
प्रकृति लोगों को शासक और शासित की श्रेणी में बांटती है। ये क्षमता सबमें नहीं
बल्कि कुछ ही लोगों में पाई जाती हैं। इनके बीच की यह असमानता न्यायपूर्ण है।
अरस्तू का यह मानना है कि, दासों और सेवकों का होना उसी
प्रकार स्वभाविक व आवश्यक है जिसप्रकार संतान उत्पादन के लिए स्त्री का होना। दास
का यंत्र से तुलना अरस्तू करते है। दास का गुण सिर्फ आज्ञा पालन का होना चाहिए।
दासता का औचित्य इसलिए मानते है कि प्रकृति में जन्मजात असमानता है। यह प्राकृतिक
वास्तविकता है, स्वामी वर्ग की आवश्यकता के
लिए दास वर्ग का होना जरूरी है। अरस्तू के शिक्षा विचार में शिक्षा का अर्थ
नागरिकों को संविधान के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देने से है। अरस्तू
स्त्रियों की शिक्षा की बात करते है, लेकिन पुरुषों जैसी शिक्षा देने की बात नहीं करते है, क्योंकि दोनों के कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। स्त्रियों
द्वारा राजनीति में भाग लेने का समर्थन करते है। शिक्षा को तीन क्रम में बांटते
हुए पहला क्रम में 1 से 6 वर्ष के बच्चे को रखा है जिसमें भोजन व्यवस्था तथा
शारीरिक विकास की बात करते है। द्वितीय क्रम में 7 से 14 वर्ष के बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चे लिखना-पढ़ना, चित्रकला, संगीत जैसे विषय सीखें। तृतीय क्रम में 14 से 21 वर्ष के
बच्चों को रखा है, जिसमें बच्चों का चारित्रिक
और मानसिक विकास हो। शासनों का वर्गिकरण अरस्तू ने इस प्रकार किया है। जब शासन एक
व्यक्ति, कुछ व्यक्तियों अथवा
बहुसंख्यक व्यक्तियों द्वारा सामान्य हित साधना की दृष्टि से किया जाता है, तो वह शासन का शुद्ध रूप होता है, पर जब शासन चाहे वह व्यक्ति का हो, या कुछ व्यक्तियों का हो अथवा बहुसंख्यक व्यक्तियों का हो, सार्वजनिक हित की साधना की दृष्टि से नहीं किया जाता है, तो उसका रूप विकृत शासन का होता है। राज्य व्यवस्था को
सुचारु रूप से चलाने के तीन सिद्धान्त दिए है। पहला, जब एक व्यक्ति के हाथ में सत्ता होती है उसे राजतंत्र कहा है जो राज्य का
विशुद्ध रूप है। जब यह विकृत हो जाता है तब अत्याचारी शासन में तब्दील हो जाता।
दूसरा, कुछ व्यक्तियों द्वारा जब
सत्ता धारण किया जाता है तो राज्य का विशुद्ध रूप कुलीन तंत्र कहलाता है। जब यह
विकृत हो जाता है तब यह वर्ग तंत्र या गुट तंत्र का रूप ग्रहण कर लेता है। तीसरा, जब समस्त या अधिकांश व्यक्ति के हाथ में सत्ता आती है, तो राज्य का शुद्ध रूप वैधानिक राजतंत्र का होता है, लेकिन जब यह विकृत हो जाता है तो वह भिड़तन्त्र में तब्दील
हो जाता है। इस तरह अरस्तू का मानना है कि शासन का कोई भी रूप स्थायी नहीं है
परिवर्तन का स्वरूप चक्रिय होता है। शासन के तीनों रूपों में से अरस्तू ने
राजतंत्र को शासन का आदर्श रूप माना है। जो व्यक्ति सर्वगुण संपन्न हो और जो राज्य
की सब प्रजा के विविध रूपों से ज्ञात हो ऐसे व्यक्ति को सच्चे रूप से मनुष्यों में
ईश्वर माना जा सकता है। निर्धनता को क्रांति एवं अपराध की जननी मानते है। निर्धनों
की संख्या अधिक होने पर राज्य का अंत शीघ्र हो जाता है।
मंच के संयोजक नीरज कुमार ने अरस्तू के विचार पर विचार करते हुए कहा कि अरस्तू
जिस सिद्धांत को विस्तार दिए, बस्तुत: उस सिद्धांत को सर्वप्रथम उनके गुरु प्लेटो
ने प्रतिपादित किया था. प्लेटो के अनुसार कला या काव्य सिर्फ सत्य का
रह्स्योंउद्घातन करने, मानव कल्याण, शिक्षा व आनंद प्रदान एवं राष्ट्रौत्थान के
लिए हो सकता है. लेकिन बेहतर जीवन के लिए नहीं, इसलिए कवि या काव्य रचनाकारों का महत्व
वो एक मोची और बढई से कम आकते है. इसके आधार पर प्लेटो कहते है कि कविता भावों को
उद्वेलित कर व्यक्ति को कुमार्गगामी बनाता है, वो रचनात्मक काम न करके एक ऐसे काम
को अंजाम देते है, जिससे लोग कामचोर और निक्कमे बनेंगे तथा नैतिक बल, भावात्मक
स्वरूप, बौद्धिकता, शुद्ध उपयोगितावादी को कमजोड करेंगे. अर्थात प्लेटो काव्य का
महत्व को वही तक स्वीकार करते हैं जहाँ तक वह गणराज्यों के नागरिकों में सत्य,
सदाचार की भावना को प्रतिष्ठित करने में सहायक हो सकता है.
काव्य और कवि को
प्लेटो ने जिस विचार के आधार पर लगभग खारिज करते हैं, उसी काव्य और कवि को अरस्तू अपने
विचार के आधार पर स्थापित करते हैं. वे नाटक, संगीत, तर्कशास्त्र, राजनैतिक
शास्त्र, निति शास्त्र आदि विधाओं में आपसी तालमेल पाते है. वही अरस्तू अनुकरण में
पुर्नरचना का समावेश किया. उनके अनुसार अनुकरण हू-ब-हू नक़ल नहीं बल्कि उसमें
पुर्नरचना भी शामिल है. अनुकरण के द्वारा कवि और कलाकार सार्वभौम को पहचानकर पुन:
नये स्वरूप में स्थापित करता है. अरस्तू केवल जीवन के लिए नहीं बल्कि अच्छे जीवन
की पुनर्रचना की स्थापना की बात करता है. परन्तु प्लेटो राज्य हित में जीवन को
व्यवस्थित करना चाहते है.
इसलिए अरस्तू अनुकरण में काव्य और कला के माध्यम से जीवन का विस्तार होते
देख्रते है. अरस्तु के नजर में काव्य और कला जीवन जीने तथा आगे उससे अच्छे जीवन जीने का एक संस्कृति को जन्म
देने वाली ज्ञान एवं विकास की परम्परा को विकसित करना चाहते है. विकास एवं ज्ञान
के परम्परा में प्रकृति शुरूआती स्रोत है तो अनुकरण प्रकृति और जीवन को जोड़कर नये
कल्पनाओं को, नये अवधारणाओं को और नये जीवन शौली का आधार बनाता है.
इस चर्चा में अमृत अर्णव, संदीप कुमार, दाक्षम द्विवेदी,
एम. डी. आफताब हुसैन, डिम्पल भी सामिल थी.




